लोकतंत्र : संवैधानिक प्रावधान और वास्तविक व्यवहार में बड़ा अंतर

Dr Shailesh Shukla Jun 23, 2026 समसामयिकी 0

लोकतंत्र : संवैधानिक प्रावधान और वास्तविक व्यवहार में बड़ा अंतर डॉ. शैलेश शुक्ला लोकतंत्र को विश्व की सर्वाधिक जनोन्मुख और उत्तरदायी शासन व्यवस्था माना जाता है। इसकी मूलअवधारणा अत्यंत सरल और आकर्षक है—सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता होती है। जनता अपनेप्रतिनिधियों का चुनाव करती है, सरकार बनाती है और अंततः वही शासन की अंतिम स्वामिनी होती […]

रिश्वत के नए मॉडल – रिश्वत अब एप-आधारित है

डॉ मुकेश 'असीमित' May 30, 2026 व्यंग रचनाएं 0

क्या होगा जब रिश्वत भी UPI, EMI और क्रेडिट स्कोर पर मिलने लगे? प्रस्तुत है एक तीखा हास्य-व्यंग्य, जिसमें भ्रष्टाचार 2.0, BribeSync, रिश्वत क्रेडिट स्कोर और डिजिटल घूस की कल्पना के माध्यम से व्यवस्था की विडंबनाओं पर करारा कटाक्ष किया गया है।

हां हम तिलचट्टे हैं लेकिन तिल तिल कर चट नहीं करते !

Prem Chand Dwitiya May 19, 2026 व्यंग रचनाएं 0

कॉकरोच बिरादरी पर सिस्टम पर हमले का आरोप लगते ही तिलचट्टों की आपात बैठक बुला ली गई। बैठक में वृद्ध, युवा, पर्यावरण प्रेमी और राजनीतिक चेतना से लैस कॉकरोचों ने मनुष्य जाति पर पलटवार किया। उनका सीधा सवाल था—हम तो किचन वेस्ट खाते हैं, जंगलों की तबाही झेलते हैं, मिट्टी को उर्वर बनाते हैं; असली निकृष्ट जीव कौन है?

“हम ही हैं राष्ट्र, हमसे ही है राष्ट्र”

Dr Shailesh Shukla May 15, 2026 व्यंग रचनाएं 1

“जनता भविष्य नहीं देख पाती, इसलिए जनता है; और हम भविष्य पहले देख लेते हैं, इसलिए अधिकारी हैं।” “व्यवस्था नहीं सड़ी… व्यवस्था तो बहुत फलदायी है।” “मैंने केवल अवसर लिए, नियमों को समझा और संबंध निभाए।” “जब ‘मैं ही राष्ट्र’ हूँ, तो राष्ट्र की संपत्ति और मेरी संपत्ति में अंतर कैसा?” “पहले जमीन अपने नाम कराओ, फिर विकास का इंतजार करो।”

खाली वायदों का कार्ड: मुफ्त इलाज की राजनीति और अस्पतालों की त्रासदी

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 20, 2026 Health And Hospitals 0

“कार्ड हाथ में है, भरोसा दिल में है—लेकिन इलाज फाइलों में अटका हुआ है। ‘खाली वायदों का कार्ड’ एक ऐसा व्यंग्य है जो स्वास्थ्य योजनाओं के पीछे छिपी सच्चाई को बेनकाब करता है।”

बी.पी.एल. संस्कृति-हास्य व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 17, 2026 व्यंग रचनाएं 0

भारत की बी.पी.एल. संस्कृति पर तीखा व्यंग्य—जहाँ लग्ज़री कार वाले भी गरीब हैं और असली गरीब सिस्टम में फंसे हैं। पढ़ें लोकतंत्र की विडंबनाओं पर हास्य-व्यंग्य से भरपूर लेख।

शर्म आती नहीं हमें — और यह हमारी राष्ट्रीय उपलब्धि है

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 15, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“हमने बेशर्मी को साधना की तरह साध लिया है—और अब जब पड़ोसी देश सुधार की बात करते हैं, तो हमें असुविधा होने लगती है।” यह व्यंग्य न केवल भारतीय राजनीति की विडंबनाओं को उजागर करता है, बल्कि हमारे सामाजिक स्वभाव पर भी तीखा सवाल खड़ा करता है।

जब सिपाही ही चोर हो : संस्थाओं के पतन और लोकतंत्र का संकट

Dr Shailesh Shukla Apr 12, 2026 हिंदी लेख 0

जब कानून के रक्षक ही कानून तोड़ने लगें, तो न्याय, विश्वास और लोकतंत्र कैसे खोखले हो जाते हैं—इस गहन विश्लेषणात्मक लेख में संस्थागत विफलता, भ्रष्टाचार और सामाजिक पतन की पड़ताल।

डॉ. शैलेश शुक्ला की 5 लघुकथाएँ

Dr Shailesh Shukla Mar 7, 2026 लघु कथा 1

डॉ. शैलेश शुक्ला की ये पाँच लघुकथाएँ — वारिस, नमक का हक़, कागज़ की ढाल, जाति की छतरी और मुफ़्त का नशा — हमारे समाज की गहरी विडंबनाओं को उजागर करती हैं। लालच, विश्वासघात, व्यवस्था की असमानता, जातिगत राजनीति और मुफ़्तखोरी की मानसिकता पर ये कथाएँ संक्षिप्त होते हुए भी तीखा सामाजिक प्रश्न खड़ा करती हैं।

भ्रष्टाचार सर्वोत्तम व्यवहारअस्ति

Dr Shailesh Shukla Mar 7, 2026 व्यंग रचनाएं 1

सरकारी व्यवस्था की सुस्त गति में यदि कोई शक्ति अचानक फाइलों को पंख लगाकर उड़ाती दिखाई देती है, तो वह है भ्रष्टाचार। यह व्यंग्य लेख बताता है कि कैसे रिश्वत की अनौपचारिक व्यवस्था आम नागरिक, अधिकारी और ठेकेदार—सभी के लिए “सुविधाजनक तंत्र” बन चुकी है।