स्वेच्छा है भी… और नहीं भी

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 31, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

फ्री विल पूर्ण स्वतंत्रता नहीं, बल्कि दिशा चुनने की क्षमता है—जहाँ मनुष्य प्रकृति के प्रवाह से ऊपर उठने का साहस करता है।स्वतंत्र इच्छा वहीं जन्म लेती है, जहाँ मनुष्य अपने भीतर उठे विचारों को केवल देखना नहीं, बल्कि सजगता से चुनना सीखता है।

अयोध्या और लंका के बीच मनुष्य का धर्म

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 26, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

अयोध्या हमारी पहचान है, लंका हमारी उपलब्धि। धर्म इन दोनों के पार है—जहाँ साहस और विवेक मिलते हैं। रामत्व अधिकार से बड़ा है, और सत्ता से मुक्त होने का नाम है।

कीमतें आसमान नहीं छू रहीं—असल में हमारी मान्यताएँ उछल रही हैं।

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 10, 2026 समसामयिकी 0

सोना कोई उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि मानव आकांक्षाओं और असुरक्षाओं का सबसे चमकदार प्रतीक है। न वह भूख मिटाता है, न ठंड से बचाता है, फिर भी सदियों से उसे सबसे अधिक मूल्य दिया गया। इस लेख में सोने की बढ़ती कीमतों को बाज़ार की चाल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक मान्यताओं का परिणाम बताया गया है। कैसे हमने सोने को सम्मान, सुरक्षा, प्रतिष्ठा और विश्वास का पर्याय बना दिया—और बाज़ार ने इन्हीं भावनाओं को भुनाना सीख लिया। मंदिरों, बैंकों और आभूषणों में सिमटे सोने के माध्यम से यह रचना भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंधों पर गहन वैचारिक दृष्टि डालती है। यह लेख सोने से ज़्यादा मानव मन की कीमत पर सवाल उठाता है।

भाषा : संवाद नहीं, मनुष्यता की सबसे बड़ी शक्ति

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 5, 2026 आलोचना ,समीक्षा 0

प्रकृति के पास भी भाषा है—संकेतों, ध्वनियों और स्पर्श की। लेकिन मनुष्य की भाषा उसे केवल बोलने की नहीं, अनुभव को सहेजने, तर्क रचने और सभ्यता बनाने की शक्ति देती है। यह लेख भाषा को शब्द ब्रह्म, स्मृति, तर्क, न्याय और राज्य की जड़ के रूप में समझने का एक विचारोत्तेजक प्रयास है।

नया साल : कैलेंडर नहीं, चेतना का उत्सव

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 5, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

नया साल समय के बदलने का नहीं, सोच के बदलने का उत्सव है। प्रकृति जहाँ निरंतरता में जीती है, वहीं मनुष्य हर साल खुद से पूछता है—क्या मैं यही रहना चाहता हूँ? यह लेख नए साल के उत्साह, मनुष्य की अनुकूलन क्षमता और पशु-प्रवृत्तियों से आगे बढ़ने की मानवीय बेचैनी पर एक विचारोत्तेजक दृष्टि डालता है।

ग़ालिब जयंती: “फेल्ट थॉट” का सुपरस्टार—दिल भी, दिमाग़ भी

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 27, 2025 India Story \बात अपने देश की 0

27 दिसंबर को ग़ालिब सिर्फ़ याद नहीं आते—वे हमारे भीतर बोल उठते हैं। उनकी शायरी “फेल्ट थॉट” है: जज़्बात की नर्मी और तर्क की रोशनी का दुर्लभ मेल। ग़ालिब को पढ़ना मतलब अपनी उलझन, तन्हाई और हैरत के लिए सही लफ़्ज़ पा लेना—और फिर उन लफ़्ज़ों के साथ थोड़ा हल्का हो जाना। आज के डिजिटल दौर में भी ग़ालिब उतने ही ज़रूरी हैं—क्योंकि वे हमें नफ़रत से कम, समझ से ज़्यादा जोड़ते हैं।

ईश्वरीय अस्तित्व –भ्रम, भरोसा या बौद्धिक आलस्य?

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 22, 2025 Culture 0

ईश्वर को जानने की हड़बड़ी में हम स्वयं को जानने की ज़रूरत भूल जाते हैं। वेदांत विश्वास नहीं, अनुभव की बात करता है—मानने की नहीं, घटित होने की। जो अनुभूति का विषय है, उसे सिद्धांत में बाँध देना शायद सबसे बड़ी भूल है। शायद परमसत्ता ऊपर कहीं नहीं, उसी चेतना में है जिससे हम प्रश्न पूछ रहे हैं।

आत्मबोध से विश्वबोध तक — चेतना की वह यात्रा जो मनुष्य को ‘मैं’ से ‘हम’ बनाती है

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 11, 2025 Darshan Shastra Philosophy 0

“मनुष्य की सबसे लंबी यात्रा कोई भौगोलिक नहीं होती — वह भीतर जाती है। आत्मबोध से विश्वबोध तक की यह यात्रा ‘मैं’ से ‘हम’ बनने की प्रक्रिया है — जहाँ व्यक्ति स्वयं को जानकर समस्त सृष्टि से एकात्म हो जाता है। जब ‘स्व’ का दीप जलता है, तब ‘सर्व’ का सूरज उगता है — यही चेतना की परिपूर्णता है।”

नासदीय सूक्त की दार्शनिक व्याख्या

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 28, 2025 Darshan Shastra Philosophy 0

ऋग्वेद का नासदीय सूक्त ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर विश्व के सबसे प्राचीन दार्शनिक चिंतन में से एक है। यह कहता है कि जब न अस्तित्व था न अनस्तित्व, तभी कुछ अप्रकट ऊर्जा ने सृष्टि का आरंभ किया। “काम” या इच्छा पहली हलचल थी जिसने ब्रह्मांड को गति दी। यह सूक्त हमें सिखाता है कि प्रश्न ही ज्ञान का प्रथम चरण हैं—और रहस्य ही सृष्टि की सबसे बड़ी सुंदरता।

गोवर्धन पूजा — धरती, धारण और धारणा का उत्सव

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 21, 2025 Important days 0

गोवर्धन लीला केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं, बल्कि मानव चेतना की यात्रा है—जहाँ कृष्ण भक्त के रक्षक, गुरु और प्रेमस्वरूप हैं। इंद्र का गर्व, ब्रजवासियों की श्रद्धा और गिरिराज का सहारा—ये सब मिलकर बताते हैं कि ईश्वर हमें संकट से नहीं, अहंकार से मुक्त करते हैं। यह कथा सामूहिक शरणागति, भक्ति की सरलता और धर्म के जीवंत दर्शन का उत्सव है—जहाँ पर्वत केवल पत्थर नहीं, बल्कि करुणा का प्रतीक बन जाता है।