अंतरात्मा का संवाद -हिंदी कविता डा. संजय जैन द्वारा रचित

This poem is a conversation between man & his long lost
Conscience.(अंर्तआत्मा)

मेरी तुम से पहचान नही,
ना ही कोई नाता.
गर पता तुम बतला देती,
मै तुमसे मिलने आ जाता.

अंर्तआत्मा अश्रु भरी आंखों से बोली..

राह मेरी तो बडी सरल थी,
नजर साफ मैं आती थी.
पर तुमने कितने जाल बिछाये,
सौ-सौ गलियां, कई चौराहे,
कैसे ढूंढ मुझे तुम पाओगे.
रस्ते मे खो जाओगे.

तुमने मुझे कब देखा था
कैसे तुम पहचानोगे,
मेरी आवाज से भी
अंजान हो तुम,
कैसे मुझको जानोगे.

स्वर्ण मृग के पीछे जाकर
अपना सब कुछ खो आए
बहुत पुकारा था मैंने तो,
पर आवाज मेरी ना सुन पाये.

लाख कचोटा था,तुमको पर
ना तुम पर कोई असर हुआ.
अंधे,गूंगे, बहरे बनकर
सारा जीवन बसर हुआ.

जीवन की इस संध्या मे
मुझ पर ना अहसान करो.
जैसे जीते, आये अब तक
आगे भी उस राह चलो.

अफसोस मुझे, कभी नींद से
तुम्हें जगा मै ना पाई.
जीवन भर साथ रही पर
काम तुम्हारे ना आई.

डा. संजय जैन

Sanjaya Jain

शिक्षा : पी.जी एवम एम बी.ए. साहित्य उपलब्धियाँ:- नव भारत…

शिक्षा : पी.जी एवम एम बी.ए. साहित्य उपलब्धियाँ:- नव भारत टाइम्स में ब्लाक लिखता हूँ "हालचाल" और भी पत्र पत्रिकाओं और लोक कल पेपर्स में मेरी कविताएँ गीत और लेख प्रकाशित होते रहते है। संस्थाओ द्वारा अवार्ड :- करीब 200 अब तक मिल चुके है। जो की अनेक मंचों पर समाजिक संस्थाओं और क्लाब आदि द्वारा प्रदान किये गये है। व्यवसाय :- मुंबई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में प्रबंधक के पद पर कार्यरत हूँ। विशेषताएँ:- मंचों का संचालन करना, काव्य पाठ करना, आर्केस्ट्रा में गाना। ये सब मेरे शौक है। कई सामाजिक संस्थाओं से जुड़ा हुआ हूँ।

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