राहुल गांधी का वह विवादित बयान, जो एआई समिट के बाद आया, केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया भर नहीं था; उसने हमारे लोकतंत्र की गिरती हुई भाषा, सिकुड़ती हुई मर्यादा और दलगत स्वार्थों से मलिन होती सार्वजनिक चेतना को एक साथ उजागर कर दिया। राजनीति में असहमति नई बात नहीं है, विरोध भी लोकतंत्र का स्वाभाविक और आवश्यक अंग है, परंतु प्रश्न यह है कि क्या अब हम उस दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ किसी राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय मंच पर व्यवधान पैदा कर देना “काम कर देना” कहलाने लगा है? और यदि हाँ, तो फिर यह केवल एक बयान की चूक नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कारों की गहरी दरार है।
लोकतंत्र में विरोध का अधिकार पवित्र है। यह संविधान की देन है, जनता की आवाज़ का औजार है और सत्ता को मर्यादा में रखने का माध्यम भी। परंतु हर अधिकार के साथ विवेक की भी अनिवार्यता जुड़ी होती है। विरोध कब, कहाँ, किस रूप में और किस आशय से किया जाए—यही लोकतांत्रिक परिपक्वता की असली कसौटी है। यदि किसी अंतरराष्ट्रीय मंच, किसी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा से जुड़े आयोजन, या देश की सामूहिक छवि वाले अवसर पर इस प्रकार का प्रदर्शन होता है कि मुद्दे से अधिक हंगामा दिखाई दे, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है। और जब उस पर कोई बड़ा नेता मुस्कराकर यह कहे कि “कर दिया ना काम”, तब चिंता और भी गहरी हो जाती है, क्योंकि तब यह केवल कार्यकर्ताओं की उतावली नहीं रह जाती, नेतृत्व की मानसिकता का संकेत बन जाती है।
यहीं इस पूरे प्रसंग की असल बेचैनी छिपी है। यदि किसी विपक्षी नेता को यह लगता है कि राष्ट्रीय मंच पर असहजता पैदा कर देना, सुर्खियाँ बटोर लेना, और आयोजन की गरिमा को चोट पहुँचा देना एक उपलब्धि है, तो यह विपक्ष की वैचारिक दरिद्रता का लक्षण है। विरोध का अर्थ यह नहीं कि जहाँ राष्ट्र दिखे, वहाँ केवल सत्ता दिखाई दे; और जहाँ सरकार दिखे, वहाँ देश को ही मंच बनाकर खरोंचना शुरू कर दिया जाए। सरकार और देश में भेद अवश्य है, परंतु कई अवसर ऐसे होते हैं जहाँ सरकार की उपस्थिति के बावजूद दुनिया देश को ही देख रही होती है। उस क्षण यदि हम केवल दलगत चश्मा पहन लें, तो हम विरोध नहीं कर रहे होते, बल्कि अपनी ही सामूहिक गरिमा का अवमूल्यन कर रहे होते हैं।
और दुखद यह है कि आज की राजनीति में शोर को सार समझ लिया गया है। जो चीज़ कैमरे में आ गई, वही सफल मानी जा रही है। जो ट्रेंड कर गई, वही जनहित का प्रतीक घोषित हो जाती है। मुद्दा कितना ठोस था, प्रस्तुति कितनी जिम्मेदार थी, संदेश कितना परिपक्व था—ये प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। राजनीति धीरे-धीरे विचार की जगह दृश्य में बदल रही है; तर्क की जगह तमाशा ले रहा है। यही कारण है कि “काम कर दिया” जैसी पंक्ति केवल एक व्यंग्यात्मक मुस्कान नहीं लगती, बल्कि उस मानसिकता का परिचय बन जाती है जिसमें व्यवधान ही उपलब्धि है और असहजता ही रणनीति।

लेकिन इस कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही चिंताजनक है। यदि एक ओर विरोध की मर्यादा टूटी है, तो दूसरी ओर जवाब की भाषा भी गिर चुकी है। किसी भी लोकतंत्र में तीखी आलोचना स्वाभाविक है, परंतु जब उत्तर में “गद्दार”, “मीर जाफर”, “लफंगा” जैसे शब्द उछाले जाने लगें, तब यह समझ लेना चाहिए कि बहस अब विचारों की नहीं, विद्वेष की हो चुकी है। सत्ता पक्ष यदि स्वयं को राष्ट्रवाद का वाहक मानता है, तो उसे भाषा में भी वह नैतिक ऊँचाई दिखानी चाहिए जिसकी वह अपेक्षा दूसरों से करता है। विरोधी की गलती का प्रतिकार अपमान से नहीं, तर्क से होना चाहिए; अन्यथा आप भी उसी दलदल में खड़े दिखाई देते हैं, जिसकी ओर उंगली उठा रहे हैं।
यानी एक ओर एक नेतृत्व है जो अव्यवस्था को उपलब्धि की तरह प्रस्तुत करता प्रतीत होता है, और दूसरी ओर एक सत्ता है जो प्रतिवाद को गरिमा से नहीं, गाली से जवाब देती है। दोनों मिलकर लोकतंत्र के स्तर को नीचे खींच रहे हैं। एक पक्ष कहता है—मंच कोई भी हो, सुर्खियाँ चाहिए; दूसरा कहता है—असहमति कोई भी हो, उसे देशद्रोह की गंध में रंग दो। परिणाम यह होता है कि देश का नागरिक मूल प्रश्नों से भटक जाता है। वह यह नहीं सोचता कि एआई, रोजगार, नीति, संसद, संस्थाएँ, संवाद और राष्ट्रीय छवि जैसे मुद्दों पर क्या चर्चा होनी चाहिए थी; वह केवल यह देखने लगता है कि किसने किसको ज्यादा नीचा दिखाया।
यही राजनीति की सबसे बड़ी पराजय है। संसद, मंच, बहस, प्रेस वार्ता—ये सब सार्वजनिक विवेक के स्थल होने चाहिए थे; पर वे धीरे-धीरे अभिनय मंच बनते जा रहे हैं। वहाँ अब यह कम दिखता है कि कौन सही है, यह अधिक दिखता है कि कौन अधिक तीखा है। किसने बेहतर तर्क दिया, यह गौण हो गया है; किसने ज्यादा जहरीली टिप्पणी की, यह प्रमुख बन गया है। लोकतंत्र तब नहीं मरता जब केवल चुनाव रुक जाएँ; वह तब भी घायल होता है जब भाषा की मर्यादा टूट जाए, जब विरोध का सौंदर्य समाप्त हो जाए, और जब सार्वजनिक जीवन में संयम को कायरता समझ लिया जाए।
इस पूरे प्रसंग में सबसे ज्यादा पीड़ादायक बात यह है कि जिन विषयों पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए था, वे हाशिये पर चले गए। एआई जैसे महत्वपूर्ण विषय पर देश को रोजगार, तकनीक, डेटा सुरक्षा, शिक्षा, नीति-निर्माण और भविष्य की अर्थव्यवस्था पर चर्चा करनी चाहिए थी। संसद में नीति, जवाबदेही और संस्थागत गरिमा पर बहस होनी चाहिए थी। लेकिन हम आकर अटक गए—किसने मुस्कराकर क्या कहा, किसने किसे क्या कह दिया, किसने किसका माइक बंद किया, किसने किस पर कौन-सा विशेषण चला दिया। यह दृश्य किसी परिपक्व लोकतंत्र का कम, एक उत्तेजित अखाड़े का अधिक लगता है।
और यहीं से वह शर्म शुरू होती है, जिसके बारे में आप कहना चाहते हैं। शर्म केवल इस बात की नहीं कि राहुल गांधी ने ऐसा कहा। शर्म केवल इस बात की भी नहीं कि जवाब में स्तरहीन भाषा का प्रयोग हुआ। शर्म इस बात की है कि इस पूरे प्रकरण में बहुत कम लोग ऐसे दिखे जो रुककर कहें—ठहरिए, यह दोनों तरफ़ से गलत है। हम उस सामाजिक स्थिति में पहुँचते जा रहे हैं जहाँ अपने पक्ष की गलती भी हमें वीरता लगती है और विरोधी की हर चूक हमें देशभक्ति का अवसर। यह मानसिकता राजनीति को नहीं, समाज को भी प्रदूषित करती है।

दरअसल लोकतंत्र की असली सुंदरता इस बात में है कि आप प्रखर असहमति रखें, पर राष्ट्र की गरिमा का ध्यान भी रखें; आप सत्ता की आलोचना करें, पर सार्वजनिक मंचों की मर्यादा भी बचाएँ; आप विपक्ष को चुनौती दें, पर शब्दों को इतना विषैला न बना दें कि संवाद की ही संभावना समाप्त हो जाए। आज संकट यह है कि दोनों पक्ष अपने-अपने समर्थकों के बीच ताली बजवाने में इतने व्यस्त हैं कि देश की राजनीतिक संस्कृति की टूटती हुई छत किसी को दिखाई ही नहीं दे रही।
यह प्रसंग इसलिए विचारोत्तेजक है क्योंकि यह हमें दर्पण दिखाता है। उसमें हम केवल एक नेता का चेहरा नहीं देखते, हम पूरी राजनीति का चेहरा देखते हैं—थका हुआ, उत्तेजित, असहिष्णु, अवसरवादी और नैतिक रूप से कुछ धुंधला। यदि इस विवाद से कोई सीख निकाली जानी चाहिए, तो वह यही है कि राजनीति को फिर से भाषा, आचरण और अवसर की मर्यादा सीखनी होगी। विरोध को विरोध ही रहने देना होगा, विध्वंस का उत्सव नहीं बनने देना होगा। और सत्ता को भी यह समझना होगा कि हर असहमति का उत्तर अपमान नहीं होता।
देश किसी एक दल से बड़ा है, किसी एक नेता से बड़ा है, किसी एक नारे से बड़ा है। जो लोग इस बुनियादी सत्य को भूल जाते हैं, वे क्षणिक लाभ भले उठा लें, लोकतंत्र को दीर्घकालीन क्षति अवश्य पहुँचाते हैं। इसलिए यह प्रसंग केवल एक बयान का विवाद नहीं, भारतीय राजनीति की गिरती हुई ऊँचाई का संकेत है। और सच यही है कि जब राजनीति को देखकर नागरिक का मन प्रेरित होने के बजाय मलिन होने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि गिरावट अब बहस का विषय नहीं, राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुकी है।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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