राष्ट्रीय गधा पालन योजना

राष्ट्रीय गधा पालन योजना

अभी हाल में ही खबर आई कि महिलाओं के आत्मनिर्भरता अभियान के अंतर्गत पशु पालन योजना” लाई जा रही है, जिसके तहत 20 लाख रुपये तक का ऋण मिलेगा।
गाय पालो, भैंस पालो, लोन लो, सब्सिडी लो।

सरकार का तर्क भी ठीक है ,इस मह्त्वाकान्क्षी योजना से  दूध बढ़ेगा, डेयरी बढ़ेगी, अर्थव्यवस्था बढ़ेगी।

पर मुझे लगता है कि नीति आयोग को एक गंभीर विषय पर अभी तक ध्यान ही नहीं गया—गधों को इस योजना में क्यों नहीं शामिल किया गया? आखिरकार वह भी तो चौपाया है।

पर आश्चर्य यह है कि सरकार उसे चौपाया मानने के बजाय लगभग इंसान की श्रेणी में रखने पर तुली हुई लगती है। यह तो उसके गधाधिकारों” पर एक प्रकार का प्रहार है।

यह अलग बात है कि आजकल इंसान और गधे में फर्क करना थोड़ा कठिन हो गया है। पर इतना जरूरी भी नहीं कि हर जगह यह फर्क किया ही जाए। आखिर हमारी संस्कृति तो जीव मात्र में समभाव” रखने की रही है—चाहे वह आदमी हो, गधा हो या दोनों को बराबर का भाव ,व्यबहार और उपचार ।

इसी बीच अभी हाल में एक गधा बाहुल्य प्रदेश में गधा गणना हुई और परिणाम इतने चौंकाने वाले आए कि कई अर्थशास्त्री और पशु वैज्ञानिक माथा पकड़कर बैठ गए।

बताया गया कि गधों की संख्या तेजी से घट रही है।

अब यह सोचने वाली बात है कि ऐसा क्या हुआ कि यह मेहनती, मौन और मर्मज्ञ प्राणी अचानक कम होने लगा।

कई प्रश्न खड़े होते हैं—
क्या गधों में कोई जैविक म्यूटेशन हो गया?
क्या वे किसी नई प्रजाति में बदल गए?
या फिर उन्होंने नकाब पहनकर समाज में घुलमिल जाने की कला सीख ली?

मुझे तो इस गणना पर बिल्कुल भी विश्वास नहीं। लगता है बस औपचारिकता निभा दी गई।

अगर सचमुच गधा गणना को गंभीरता से लिया जाता, तो सड़क, मोहल्ले, बाज़ार, दफ्तर, विश्वविद्यालय और सरकारी संस्थानों में भी एक बार व्यापक तहकीकात की जाती।

संभव है कई गधे वहाँ मानव वेश में सेवा दे रहे हों।

अब गधों के पहचान चिन्ह भी अपडेट करने पड़ेंगे। एक नया गधा मानकीकरण आयोग” बनाना पड़ेगा।

हो सकता है यह मेरी नजरों का फर्क हो, पर जहाँ भी मैं नज़र घुमाता हूँ, मुझे तो चारों ओर ढेरों मेरे जैसे ही लोग दिखाई देते हैं जो बिना शिकायत बोझ ढोते जा रहे हैं—घर का बोझ,कार्यालय का बोझ,
समाज का बोझ।

खैर, मान भी लें कि गधे सचमुच कम हो रहे हैं, तो पशुपालन योजना में गधा पालन का एक अलग क्लॉज जोड़ देना चाहिए। आर्थिक दृष्टि से भी यह आवश्यक है।

कहा जाता है कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में गधों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वहाँ गधा पालन उद्योग इतना विकसित है कि कई अर्थशास्त्री उसे गधाग्राही अर्थव्यवस्था” कहने लगे हैं।

जब पड़ोसी देश में गधे अर्थव्यवस्था संभाल सकते हैं, तो हम क्यों पीछे रहें?

वैसे भी हम ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनने का सपना देख रहे हैं। और यह सपना केवल भाषणों से नहीं, बल्कि नवाचार से पूरा होगा।

इसलिए मेरा सुझाव है कि सरकार को गधा संरक्षण मिशन भी चलाना चाहिए।
गधेपन को संरक्षित रखना भी आवश्यक है—क्योंकि यही तो हमारी कई व्यवस्थाओं की आधारशिला है।

जिन घरों में गधे कम पाए जाएँ, वहाँ प्रोत्साहन राशि दी जाए।
और जहाँ पहले से गधे मौजूद हों, वहाँ उन्हें राष्ट्रीय संसाधन घोषित कर दिया जाए।

महिलाओं के लिए तो यह योजना विशेष रूप से सफल हो सकती है।

कुछ महिलाएँ शिकायत भी कर सकती हैं-
“सरकार थोड़ी देर से जागी है, हम तो बरसों से इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर हैं।”

दरअसल भारतीय गृहस्थी में गधा पालन कोई नई चीज़ नहीं है। गाय और भैंस पालन का अनुभव हर महिला को नहीं होता, पर गधा पालन का व्यावहारिक प्रशिक्षण उन्हें विवाह के बाद स्वतः मिल जाता है।

सुबह की पुकार सुनिए—
ए जी… सुनते हो…
या थोड़ा और स्पष्ट—
ओ जी… सुनते हो…

यह पुकार दरअसल एक प्रकार का गृहस्थ-घोषणा पत्र है। जैसे ही यह शब्द निकलते हैं, पति के कान उसी तत्परता से खड़े हो जाते हैं जैसे किसी खेत में गधे के।

अगर इसे थोड़ा डीकोड किया जाए तो संभव है इसका असली भाव कुछ ऐसा हो—
ओ गधे… सुनते हो…

इतना श्रम, इतनी सहनशीलता और इतना संयम अगर किसी जीव में है, तो विज्ञान की भाषा में उसे उन्नत गधा प्रजाति” कहा जा सकता है।

मेरी विनम्र सलाह यह भी है कि जो लोग पहले से गधे पाल रहे हैं, उन्हें “एड-ऑन लोन” दिया जाए।

सरकार चाहे तो इस पर भी विचार कर सकती है कि जिन घरों में पहले से गधे के छदम भेष में पति  मौजूद है, वहाँ पति पंजीकरण योजना” लागू की जाए ताकि वह सरकारी अभिलेखों में घरेलू गधा संसाधन” के रूप में दर्ज हो सके।

इससे देश की आर्थिक स्थिति का भी सही आकलन होगा।

हाँ, एक खतरा जरूर है—अगर सरकार सचमुच गधा पालन को बढ़ावा देने लगी तो कुछ लोग इसका अनुचित लाभ उठाने की कोशिश करेंगे।

पर सरकार भी इतनी भोली नहीं है।

उसने पहले से ही इस नस्ल के प्रतिनिधियों को कई विभागों में बिठा रखा है, जो गधेपन की इस महान प्रजाति के संरक्षण और संवर्धन में एड़ी-चोटी का जोर लगा देंगे।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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