तंत्र का असली स्वरूप और तांत्रिक बाज़ार का भ्रम : युवाओं को कैसे भरमा रहा है नकली तंत्र

आजकल “तंत्र” शब्द सुनते ही लोगों के मन में दो तरह की तस्वीरें उभरती हैं—एक, किसी अँधेरे कमरे में धूनी रमाए बैठे, खोपड़ी और हड्डियों से घिरे किसी रहस्यमय साधक की; और दूसरी, टीवी चैनलों या यूट्यूब पर दिखने वाले ऐसे महातांत्रिकों की जो दावा करते हैं कि वे प्रेम-विवाह से लेकर दुश्मन-विनाश तक हर समस्या का समाधान चौबीस घंटे में कर सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन दोनों तस्वीरों का वास्तविक तंत्र से उतना ही संबंध है जितना किसी फिल्मी डॉक्टर का आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान से।

तंत्र दरअसल भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की एक अत्यंत गंभीर और गहरी साधना-पद्धति रही है। संस्कृत में “तंत्र” शब्द का मूल अर्थ ही है—व्यवस्था, प्रणाली या वह ढाँचा जिसके सहारे किसी ज्ञान का विस्तार हो। “तन्” धातु से बना यह शब्द विस्तार का बोध कराता है। इस दृष्टि से तंत्र का वास्तविक उद्देश्य था चेतना का विस्तार, ऊर्जा का संतुलन और मनुष्य के भीतर सोई हुई संभावनाओं का जागरण। प्राचीन शैव, शाक्त और बौद्ध परंपराओं में तंत्र एक प्रकार का आध्यात्मिक विज्ञान माना जाता था। उसमें मंत्र, ध्यान, योग, ऊर्जा-चक्र, कुंडलिनी और चेतना के स्तरों की चर्चा होती थी। लेकिन यह सब किसी चमत्कारिक शक्ति प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि आत्मबोध और आंतरिक परिवर्तन के लिए था।

भारतीय साधना परंपराओं में एक दिलचस्प बात यह रही है कि कई मार्ग शरीर को त्याज्य मानते रहे, जैसे कि कठोर तपस्या और संन्यास की कुछ धाराएँ। पर तंत्र ने शरीर को ही साधना का साधन माना। तंत्र कहता है कि शरीर कोई बाधा नहीं, बल्कि चेतना का एक सूक्ष्म उपकरण है। जिस प्रकार एक संगीतकार अपने वाद्य को साधता है, उसी प्रकार साधक अपने शरीर, प्राण और मन को साधता है। तंत्र का मूल विचार यह था कि मनुष्य के भीतर जो ऊर्जा है—इच्छा, भावना, कामना, क्रोध—उसे दबाने से नहीं, बल्कि समझने और रूपांतरित करने से चेतना का विकास होता है।

इसी कारण तंत्र को कभी भी आसान साधना नहीं माना गया। प्राचीन ग्रंथों में इसे अत्यंत अनुशासित और कठिन मार्ग बताया गया है। गुरु-शिष्य परंपरा में यह ज्ञान गुप्त रखा जाता था, क्योंकि यह माना जाता था कि बिना तैयारी और बिना विवेक के यह मार्ग व्यक्ति को भ्रमित भी कर सकता है। इसलिए योग्य गुरु के बिना तंत्र-साधना की कल्पना भी नहीं की जाती थी।

अब प्रश्न उठता है कि इतना गंभीर और दार्शनिक मार्ग धीरे-धीरे जादू-टोने और तांत्रिक चमत्कारों की कहानियों में कैसे बदल गया। इसका उत्तर मनुष्य की कुछ शाश्वत कमजोरियों में छिपा है—भय, लालच और चमत्कार की लालसा। जब भी किसी ज्ञान परंपरा में रहस्य का तत्व होता है, तो उसके आसपास अंधविश्वास उगने में देर नहीं लगती। धीरे-धीरे तंत्र के कुछ प्रतीकों—मंत्र, यंत्र, अनुष्ठान—को लोगों ने चमत्कार से जोड़ना शुरू कर दिया।

समाज में यह धारणा फैलने लगी कि तांत्रिक शक्तियों से दुश्मनों को नष्ट किया जा सकता है, प्रेम को वश में किया जा सकता है, धन को आकर्षित किया जा सकता है या भाग्य को पलटा जा सकता है। और जहाँ ऐसी धारणाएँ जन्म लेती हैं, वहाँ बाज़ार भी जल्दी ही जन्म ले लेता है। आज तंत्र एक तरह का “आध्यात्मिक उद्योग” बन चुका है। अखबारों में छोटे-छोटे विज्ञापन, टीवी चैनलों के कार्यक्रम, यूट्यूब के वीडियो—हर जगह कोई न कोई “विश्व प्रसिद्ध महातांत्रिक” मिल जाएगा जो दावा करेगा कि वह आपकी हर समस्या का समाधान कर सकता है।

आप ध्यान दें तो इन तांत्रिक दावों की सूची लगभग हमेशा एक जैसी होती है—प्रेम-विवाह में बाधा दूर करना, पति-पत्नी का झगड़ा समाप्त करना, व्यापार में लाभ दिलाना, दुश्मन को परास्त करना, या किसी पर “काला जादू” करना। इन दावों में आध्यात्मिकता कम और मनोविज्ञान अधिक होता है। असल में यह भय और आशा का खेल है। पहले आपको यह विश्वास दिलाया जाता है कि आपकी समस्या असाधारण है—किसी ने आप पर तंत्र कर दिया है, ग्रह-नक्षत्र बिगड़ गए हैं या कोई अदृश्य शक्ति आपको रोक रही है। फिर उसी भय का समाधान एक महंगे अनुष्ठान या ताबीज़ के रूप में बेच दिया जाता है।

आधुनिक समाज में यह खेल इसलिए भी चल जाता है क्योंकि लोग जल्दी समाधान चाहते हैं। आज का युवा जीवन के कई दबावों से गुजर रहा है—करियर की चिंता, रिश्तों की जटिलता, आर्थिक असुरक्षा, सामाजिक अपेक्षाएँ। जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि आपकी समस्या का समाधान किसी “गुप्त तांत्रिक विधि” से तुरंत हो सकता है, तो वह बात आकर्षक लगने लगती है। यह वैसा ही है जैसे कोई छात्र परीक्षा की तैयारी छोड़कर “शॉर्टकट नोट्स” खोजने लगे।

पर वास्तविकता यह है कि जीवन की जटिल समस्याओं का समाधान किसी ताबीज़ या अनुष्ठान से नहीं होता। असली परिवर्तन हमेशा समझ, प्रयास और समय से आता है। यही कारण है कि असली तंत्र का जोर बाहरी चमत्कारों पर नहीं, बल्कि आंतरिक परिवर्तन पर था। तंत्र का उद्देश्य यह नहीं था कि आप अपने दुश्मन को नष्ट कर दें, बल्कि यह था कि आप अपने भीतर के भय, लालच और अज्ञान को पहचान सकें।

यदि हम तुलना करें तो असली तंत्र और आज के तांत्रिक बाज़ार में उतना ही अंतर है जितना चिकित्सा-विज्ञान और झोलाछाप इलाज में होता है। असली तंत्र चेतना को बदलने की साधना है, जबकि नकली तंत्र समस्याओं का जादुई समाधान बेचने का व्यवसाय है। एक व्यक्ति को स्वतंत्र और जागरूक बनाता है, दूसरा उसे भय और आश्रय में बाँध देता है।

यह भी दिलचस्प है कि जितना अधिक कोई तांत्रिक चमत्कार का दावा करता है, उतना ही वह असली तंत्र से दूर होता है। क्योंकि वास्तविक आध्यात्मिक परंपराएँ हमेशा विनम्र और संयमित होती हैं। वे कभी यह दावा नहीं करतीं कि वे जीवन की हर समस्या को पल भर में मिटा देंगी। बल्कि वे यह कहती हैं कि जीवन की कठिनाइयाँ ही मनुष्य के विकास का अवसर हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम तंत्र शब्द को अंधविश्वास की धुंध से बाहर निकालकर समझ की रोशनी में देखें। भारत की आध्यात्मिक परंपराएँ इतनी समृद्ध और गहरी रही हैं कि उन्हें केवल चमत्कारों की कहानियों में सीमित कर देना अन्याय है। तंत्र का वास्तविक स्वरूप मनुष्य की चेतना को समझने का एक प्रयास था—यह समझने का कि मनुष्य केवल शरीर नहीं है, केवल मन नहीं है, बल्कि ऊर्जा और चेतना का एक जटिल ताना-बाना है।

यदि इस दृष्टि से देखा जाए तो तंत्र का सबसे बड़ा संदेश यही है कि मनुष्य अपने भीतर झाँकना सीखे। वह अपने भय, इच्छाओं और भ्रमों को समझे। क्योंकि असली मुक्ति बाहर से नहीं आती, वह भीतर से जन्म लेती है। और शायद यही कारण है कि जितना अधिक हम समझ की ओर बढ़ते हैं, उतना ही चमत्कारों का आकर्षण कम होने लगता है।

कहने का अर्थ यह नहीं कि भारतीय परंपराओं में रहस्य या प्रतीक नहीं थे। वे थे, पर उनका उद्देश्य रहस्य पैदा करना नहीं, बल्कि अनुभव की गहराई को व्यक्त करना था। दुर्भाग्य से समय के साथ वही प्रतीक तमाशा बन गए।

आज जब कोई युवा “तंत्र” शब्द सुनता है तो उसे या तो डर लगता है या हँसी आती है। जबकि सच्चाई यह है कि तंत्र न डर का विषय है, न तमाशे का। वह मनुष्य की चेतना की यात्रा का एक अध्याय है—गंभीर, जटिल और गहरा।

और शायद यही समझ सबसे आवश्यक है—क्योंकि जब ज्ञान बाज़ार में बिकने लगता है तो वह धीरे-धीरे ज्ञान कम और व्यापार अधिक बन जाता है। इसलिए विवेक ही सबसे बड़ा उपाय है। यदि कोई व्यक्ति आपको यह विश्वास दिलाने की कोशिश करे कि आपकी हर समस्या का समाधान किसी तांत्रिक अनुष्ठान में छिपा है, तो थोड़ा ठहर कर सोचना चाहिए—कहीं समस्या हमारे जीवन में कम और उस व्यक्ति की दुकान में अधिक तो नहीं।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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