पुष्पक विमान से पुष्प वर्षा
ठीक ही कहा गया है—हमारा शहर भले ही साल भर नालियों, गड्ढों और घोषणाओं में उलझा रहे, पर धार्मिक आयोजनों के मामले में उसकी आस्था कभी बीमार नहीं पड़ती। यहाँ धर्म मौसमी नहीं, बारहमासी फसल है। जैसे खेतों में गेहूँ–चना बोया जाता है, वैसे ही शहर की गलियों में हर साल आयोजन बो दिए जाते हैं—कहीं रामनवमी, कहीं शिवरात्रि, कहीं गणेश महोत्सव।
आयोजकों के चेहरे पर बसंती बयार से सुर्ख हुए गाल देखिए तो लगेगा जैसे धर्म की मंडी में इस बार बोली कुछ ज़्यादा ही ऊँची लगने वाली है। “अच्छा कटेगा माल इस बार भी ”—यह भाव उनके चेहरे पर साफ़ पढ़ा जा सकता है। पुण्य लाभ लेने वालों की लंबी कतारें हैं, बस फसल तैयार हो और काटकर घर ले जाई जाए। साल भर की रोज़ी-रोटी का यही तो जुगाड़ है इन किसान रूपी आयोजकों का, मित्र।
धर्म अब ईश्वर से ज़्यादा व्यवस्था का कामचलाऊ विकल्प बन चुका है। चार पुरुषार्थों में से मोक्ष को हमने भविष्य निधि में—एक तरह के रिटायरमेंट प्लान की तरह—रख छोड़ा है। अभी इतनी भी क्या जल्दी है, जीते-जी कौन मोक्ष की बात करे, मित्र! फिलहाल तो कामना, अर्थ और थोड़ी-बहुत प्रतिष्ठा—बस यही आज के धार्मिक आयोजनों का त्रिवेणी संगम है।
भक्ति का उद्देश्य आत्मा का कल्याण करना है—ऐसा कहा जाता है। पर आत्मा इस देह में ही तो बसती है , आत्मा तक एंट्री से पहले देह का कल्याण ला प्रवेश शुल्क जरूरी है । सो बस मंच मिल जाए, माइक मिल जाए और कहीं नाम चमक जाए—धर्म से हमें फिलहाल यही आशा है।
इन आयोजनों में संस्थाएँ ऐसे उतरती हैं जैसे चुनावी मैदान में प्रत्याशी उतरते हैं। चंदा जुटाने में वही तेज़ी, वही लगन—क्योंकि साल भर की रोटी इसी में से निकलनी है। बाबा गणेश की झाँकी तो मानो नगर का मल्टीपरपज़ मॉल हो गई है—एक बहु-उद्देशीय लवाजमा।
छिछोरों के लिए फब्तियाँ कसने का मंच, बेरोज़गार युवाओं के लिए भोंडे नृत्य प्रदर्शन, रील और सेल्फ़ी के शौकीनों के लिए कंटेंट, बच्चों के लिए झूला–फुग्गा–खिलौने, महिलाओं के लिए दस दिन की गपशप, ठेलेवालों के लिए रोज़गार और नेताओं के लिए छवि सुधार योजना।
सबको कुछ न कुछ मिल जाता है। मंच–माला–माइक प्रेमियों के लिए भी यथोचित प्रबंध होता है—उनकी खर्च करने की क्षमता के अनुसार।
शहर की जनता त्रस्त नहीं, मस्त है। कचरा, टूटी सड़कें, बदबदाती नालियाँ, भिनभिनाती मक्खियाँ—इन सब पर जनता के कान में जूँ तक नहीं रेंगती।
इस बार मामला कुछ ज़्यादा ही दिलचस्प था।
शहर के एक नेताजी, जिनकी छवि पिछले पाँच वर्षों में शहर की सड़क जैसी हो गई थी—कहीं गड्ढा, कहीं दरार, कहीं पैबंद—उन्होंने सोचा कि क्यों न इस बार गणेश महोत्सव में अपनी इज़्ज़त की टूटी सड़क पर फिर से लाडले नेताजी का प्लास्टर चढ़ा लिया जाए।
लेकिन राजनीति में विरोधी भी कम चालाक नहीं होते। प्रतिद्वंद्वी पार्टी ने आयोजन समिति को बहला-फुसलाकर चंदा बढ़ा दिया और झट से मुख्य अतिथि की कुर्सी हथिया ली। नेताजी के हाथ से यह मौका भी निकल गया।
दुख हुआ—इतना कि राजनीति की भाषा में इसे “वैचारिक पीड़ा” कहा जाता है।
अब कुछ बड़ा करना ज़रूरी था। नेताजी गहरी चिंता में डूबे हुए थे कि कैसे विपक्ष की लुटिया डुबोई जाए और अपनी लुटिया किनारे लगा ली जाए।
तभी किसी शुभचिंतक ने सुझाव दिया—
“क्यों न हेलीकॉप्टर से फूलों की वर्षा करवा दी जाए?”
नेताजी की आँखें चमक उठीं।
“वाह! चुनाव में हेलीकॉप्टर से प्रचार का सपना अधूरा रह गया था—कम से कम गणेश विसर्जन रैली में ही सही।”
पाँच लाख का खर्चा था, पर इसे खर्चा नहीं, निवेश समझा गया। आखिर छवि भी तो एक एसेट होती है।
और फिर वह दिन आया।
शहर ने ऐसा तमाशा पहले नहीं देखा था। ऊपर आसमान में हेलीकॉप्टर, नीचे जनता की गर्दनें टेढ़ी, आँखें फैली हुईं। फूल बरसने लगे। हेलीकॉप्टर में नेताजी सशरीर और सपरिवार विराजमान थे—ऐसे कि लगने लगा मानो आकाश मार्ग से स्वयं देवता उतर आए हों पुष्प वर्षा करने।
फूल गिर रहे थे। नेताजी ऊपर से रैली को निशाना बनाकर फूल फेंक रहे थे—मानो ऊपर से कोई मिसाइल दागी जा रही हो।
लेकिन फूल भी आखिर फूल ही थे। रैली पर गिरने के बजाय अधिकतर पास की नाली में जा गिर रहे थे।
रैली से बेखबर कुछ बच्चों की नज़र उन फूलों पर पड़ी। वे ऊपर झाँकने लगे, हाथ फैलाकर। उन्हें लगा—शायद फूलों के साथ कुछ फ़ूड पैकेट भी गिर जाएँ।
पास ही नाली के किनारे एक कुत्ता कुंडली मारे पड़ा था। उसके ऊपर कुछ फूल गिरे तो वह घबराकर उठा और “कूँ-कूँ” करता हुआ वहाँ से भाग गया।
खैर, फूलों का क्या है—उनकी मर्ज़ी जहाँ गिरें।
लेकिन आयोजन सफल रहा। रैली को जितना कवरेज मिला, उससे कहीं ज़्यादा नेताजी की हेलीकॉप्टर वाली पुष्प वर्षा को मिला।
शहर में चर्चा होने लगी—नेताजी की धर्मप्रेमी छवि रातोंरात चमक कर उजली हो गई।
एक सफल आयोजन के लिए बधाइयों का तांता नेताजी के घर पर लग गया।
बस असफल रहा तो—सड़क, सफ़ाई और जनता की याददाश्त।
फूलों की वर्षा की मार शायद जनता की याददाश्त झेल नहीं पाई। वह नेताजी के पुराने कारनामे भूल गई।
इधर बाबा गणेश पर फूल बरसे या नहीं—इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं। बाबा गणेश तो अगले वर्ष फिर आएँगे, उन्हें तो आना ही है।जनता से ज़्यादा तो ये आयोजक हैं जो हर हाल में उन्हें बुलाकर ही मानेंगे।
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