बोनसाई की कला

बोनसाई की कला

आप जानते हैं, बोनसाई क्या है?
बोनसाई दरअसल एक कला है—किसी वृक्ष को वृक्ष बनने से रोकने की कला।

एक पौधे में स्वाभाविक संभावना होती है कि वह बढ़े, फैलें, आकाश को छुए, अपनी शाखाएँ दूर-दूर तक फैलाए। लेकिन बोनसाई की दुनिया में ऐसा नहीं होने दिया जाता। वहाँ पौधे को समय-समय पर काटा जाता है, उसकी जड़ों को सीमित किया जाता है, शाखाओं को मोड़ा जाता है—ताकि वह बड़ा न हो जाए। वह सुंदर तो दिखे, पर अपनी पूरी ऊँचाई तक न पहुँच पाए।

पिछले वर्ष मेरी दक्षिण भारत यात्रा के दौरान मुझे चाय के बागान देखने का अवसर मिला। वहाँ एक रोचक बात पता चली। चाय का जो पौधा हम देखते हैं, वह वास्तव में पौधा नहीं, बल्कि एक वृक्ष बनने की पूरी क्षमता रखने वाला पेड़ है। यदि उसे बढ़ने दिया जाए तो वह बाबूल की तरह एक अच्छा-खासा वृक्ष बन सकता है।

लेकिन उसे ऐसा होने नहीं दिया जाता।

जैसे ही वह ऊपर की ओर बढ़ने लगता है, उसे काट दिया जाता है। उसकी शाखाएँ छाँट दी जाती हैं। जड़ों को नियंत्रित रखा जाता है। खाद, पानी, हवा और धूप—सब कुछ दिया जाता है, पर केवल उतना ही जितना उसे जीवित और उपयोगी बनाए रखे। क्योंकि उसकी पत्तियाँ हमारे काम की हैं। पर यदि वह बहुत ऊँचा हो गया तो उन पत्तियों तक पहुँचना कठिन हो जाएगा।

इसलिए उसे हमारे कद के बराबर रखा जाता है।

यही बोनसाई की असली कला है—
किसी को पोषित भी करो और सीमित भी रखो।

ज़रा सोचिए, यही बात हमारे सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक जीवन में भी कितनी सटीक बैठती है। संस्थाओं में, संगठनों में, समाज में—हर जगह यह अनकहा नियम काम करता है।

जब तक आपका कद छोटा है, सबको कोई परेशानी नहीं होती।
आप बराबर के पौधे बने रहते हैं—तो सब खुश रहते हैं।

लेकिन जैसे ही आप थोड़ा ऊँचा होने लगते हैं,
जैसे ही आपका कद बढ़ने लगता है,
सबसे पहले बेचैनी उन्हीं लोगों को होने लगती है जिन्होंने आपको कभी सींचा था।

वे कहते नहीं, पर संकेत दे देते हैं—
“भाई, कद ज़रा हमारे बराबर ही रखो।”

और फिर शुरू हो जाती है छँटाई।

यही बोनसाई की कला है—
किसी को इतना ही बढ़ने देना कि वह उपयोगी बना रहे,
पर इतना नहीं कि वह स्वतंत्र वृक्ष बन जाए।

इस दुनिया में कई पेड़ इसलिए पौधे बनकर रह गए—
क्योंकि जिस बाग़ में वे पले-बढ़े,
वह बाग़ उनका अपना नहीं था।

उनकी नियति बस इतनी थी—
कि वे पत्तियाँ देते रहें
और माली उन्हें तोड़ता रहे।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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