विश्व पृथ्वी दिवस : चेतना का अंतिम निमंत्रण
धरती अपनी मूक भाषा में संकेत दे रही है, बस उन्हें समझने की आवश्यकता है। इधर मनुष्य, जो स्वयं को सृष्टि का सबसे बुद्धिमान प्राणी घोषित कर चुका है, उन संकेतों को अनसुना करने की अद्भुत प्रतिभा भी रखता है। हम ऐसे तुच्छ अस्तित्व वाले प्राणी होकर भी स्वयं को सुरक्षित नहीं रख पा रहे, फिर भी “सेव द प्लेनेट” का दावा करते हैं। हम विश्व पृथ्वी दिवस मना रहे हैं, पर क्या यह मात्र एक उत्सव भर नहीं रह गया है। क्या यह वास्तव में आत्मपरीक्षण का दिन बन पाया है।
प्रकृति ने अपने राग बदल दिए हैं। जहाँ कभी राग भैरव की शांति थी, वहाँ अब एक अनसुनी बेचैनी गूँज रही है। हवा, जो जीवनदायिनी थी, अब धीरे-धीरे विषाक्त स्मृतियों का वाहक बनती जा रही है। यह वही हवा है जिसे हमने उद्योगों की चिमनियों, वाहनों के धुएँ और अपने अति-उपभोग से संक्रमित कर दिया। हम साँस तो ले रहे हैं, पर हर साँस के साथ एक अदृश्य पृथ्वी-ऋण अपने ऊपर चढ़ा रहे हैं, जिसका भार हमारी आने वाली पीढ़ियों को उठाना होगा। क्या वे इसे चुका पाएँगी।
सूर्य की किरणें, जो कभी उष्मा और ऊर्जा का प्रतीक थीं, अब प्रखरता की सीमा लाँघकर दंड जैसी प्रतीत होने लगी हैं। यह तापमान का बढ़ना मात्र एक भौतिक घटना नहीं, बल्कि हमारी असंतुलित जीवनशैली का प्रतिबिंब है। हमने धरती के हृदय को खोद-खोदकर उसके संसाधनों का दोहन किया, और अब वही धरती भूकंपों और अतिवृष्टि के रूप में अपनी पीड़ा प्रकट कर रही है।
नदियाँ, जिन्हें हमने प्राणदायिनी कहा, आज या तो सिकुड़ रही हैं या अपने ही तटों को तोड़ती हुई उफान पर हैं। हिमनद, जो सदियों से स्थिर थे, पिघलकर समय की धारा में विलीन हो रहे हैं। मौसम की चरम स्थितियाँ, अनियमित वर्षा, असंतुलित जलवायु—ये सब महज घटनाएँ नहीं, स्पष्ट चेतावनियाँ हैं।
विडंबना यह है कि प्रकृति के ये संकेत भी हमें समझ नहीं आते। हम समाधान की जगह उत्सव खोजने लगते हैं और संकट को भी एक दिवस में बदलकर संतोष कर लेते हैं। यदि पृथ्वी दिवस केवल भाषणों, पोस्टरों और औपचारिक वृक्षारोपण तक सीमित रह गया, तो यह भी एक सांस्कृतिक कर्मकांड बनकर रह जाएगा।
आवश्यकता इस बात की है कि हम संरक्षण को नारा नहीं, जीवनशैली बनाएँ। उपभोग की अंधी दौड़ से थोड़ा विराम लें, संसाधनों के प्रति संवेदनशील बनें और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का भाव विकसित करें। यही छोटे कदम बड़े परिवर्तन की दिशा तय करेंगे।
प्रश्न यह नहीं कि धरती बचेगी या नहीं। धरती अपने संतुलन को पुनः स्थापित कर ही लेगी। प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य उस संतुलन में अपना स्थान बचा पाएगा, या उसका अस्तित्व केवल एक अल्पकालिक प्रसंग बनकर रह जाएगा।
समय अभी भी है, पर संकेत अब चेतावनी में बदल चुके हैं।
पृथ्वी पुकार रही है, क्या हम सचमुच सुन रहे हैं।
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