वादों की कोख से पैदा होते तोहफे !
डॉ प्रेमचंद द्वितीय
वैसे भी लोकतंत्र में चुनाव होना लाजमी है । जब भी कोई चुनाव आता है वह तोहफे लाता है । मुफ्त तोहफो से सजे चुनाव मतदाताओं को रिझाते हैं और पार्टियों को तोहफे सत्ता दिलाते है , मुफ्त तोहफे देने की राजनीति की परंपरा बन गई है ।जो पार्टी तोहफें देती है वह कहती है कि हम भलाई के लिए दे रहे हैं और विपक्ष द्वारा दिए जाने वाले मुफ्त तोहफे, मुफ्त रेवड़ी दिखती है। मुफ्त तोहफे के जरिए है वोट देने वाले पांच साल के लिए तोहफे देने वालों को कुर्सी दे देते हैं और तोहफे लेकर मतदाता अगले चुनाव में इनसे बड़े तोहफो की उम्मीद रख कर पांच साल की गहरी नींद में सो जाते हैं और चुनाव की आहट आने पर जागृत होते हैं ताकि उन्हें तोहफे मिले । पांच साल तक फिल्मी तर्ज पर तोहफा …. तोहफा लाया…चुनाव आया…का राग गाते है ।
मुफ्त तोहफो की चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका पर पं शिवनारायण जी कुछ राज्यों के चुनावी तोहफो की पोटली लेकर सुबह-सुबह घर आ टपके और बोले तोहफो ने तो चुनाव की टोह लेने का जिम्मा ले लिया है । जिस चुनाव में मुफ्त तोहफे नहीं होते है वे चुनाव चुनाव नहीं कहलाते है। वे बोले आपको पता नहीं मुफ्त तोहफे तो सीधे सीधे मतदाताओं को परोसे नहीं जाते हैं। मुफ्त तोहफो पर रिसर्च होती है ,वादों की फेहरिस्त बनती है और इस फेहरिस्त में से तोहफे निकाले जाते हैं ।वादों की फेहरिस्त जन्म से लेकर मृत्यु तक,लड़कपन से जवानी तक, बचपन से लेकर अबोव पचपन तक और जवानी की अंगड़ाई से लेकर झुर्री पढ़ने तक कौन से तोहफे दिए जा सकते हैं।यह सोचकर तय होता है ।
वे बोले चुनाव में मुफ्त तोहफे केवल मत देने वाले को ही देते हैं ऐसा नहीं है। तोहफे ऐसे भी होते है जो मतदाताओं को हिप्नोटाइज कर देते है ।
इस पर चर्चा के दौरान कॉलोनी से आए सुनील भैया बोले एक महिला नेत्री ने सत्ता में आने के लिए मुफ्त भैंसे देने के तोहफे देकर सत्ता हासिल कर ली थी।
वे आगे बोले चुनाव और मुफ्त तोहफों का गहरा नाता है ।मुफ्त तोहफों को, फ्री ब्रिज, राजनीति भी कहते हैं ।इस ,फ्री बीज, राजनीति का उद्देश्य पाटिॅयां यह मानती है कि सहूलियत देंगे तो कम से कम वोट तो मिलेंगे। मुफ्त तोहफे छः सात दशक पहले बच्चों को , मिड डे मील, से प्रारंभ हुए, फिर 1 रूपएकिलो चावल.., फिर मुफ्त बिजली… अम्मा का कैंटीन …मुफ्त एलपीजी, मुफ्त नमक, मुफ्त पानी ,मुफ्त दवाई, मुफ्त सफर.. ये सब कुछ राज्यों में शुरू हुए.और इन तोहफों से सत्ता मिलने लगी तो मुफ्त तोहफों का दायरा बढ़ने लगा। छोटे-बड़े चुनाव ,विभिन्न राज्यों के चुनाव यहां तक के केंद्र की सरकार के चुनाव के लिए भी तोहफों को देने की सुनामी आ गई ।मुफ्त तोहफे पाकर गांव में चौपाल पर ,फ्रीबीज, के कारण लोग फ्री रहने लगे ताश, चौपड़,शतरंज,और मासी मल्ले में व्यस्त देखे गए। मुफ्त तोहफो से मतदाता सोचने लगा कि सहूलियत मिल रही है। उधर राजनीतिक पार्टियां इसे राजनीतिक निवेश मानकर धड़ल्ले से तोहफो की घोषणा,अपने घोषणा पत्र में करने लगी ।
कई राज्यों में जन्म होने पर डिलीवरी होते ही मुफ्त पैसे डिलीवर कर दिए जाते हैं ।बेटे बेटियों के स्कूल जाने पर पढ़ाई के खर्च करने का तोहफा सरकार देती है। घर में काम करने वाली महिला के खाते में हर माह बिला नागा तोहफे की राशि जमा हो जाती है ।बेटियों के विवाह की जिम्मेदारी भी इन तोहफों ने ले रखी है ,वही उनको बसों में मुफ्त सफर करने का तोहफा भी दिया जाता है ।घर में मिक्सर का तोहफा, बेटों को बेरोजगार भत्ता और स्कॉलरशिप तथा रील बनाने के लिए मोबाइल और लैपटॉप भी मुफ्त तोहफे के हिस्से होते हैं। घर में वातावरण को ठंडा करने के लिए फ्रीज, मनोरंजन के लिए टीवी, महिलाओं को शर्मा कैसे महिलाओं को कपड़े धोने की मशीन ,वृद्ध होने पर हजारों की वृद्धावस्था पेंशन की सहूलियत के तोहफे अब लालच की गिनती में नहीं आकर के सामान्य प्रक्रिया में आ गए हैं।
इस तरह लोकतंत्र में, फ्री बीज, का रोपण होने से लोकतंत्र मजबूत हो रहा है तो लोग फ्री हो रहे हैं ।जो इन तोहफों को लालच ,रेवड़ी और मुफ्त खोरी बताते हैं वह लोकतंत्र की मजबूती में रोडे अटकाने वाले माने जाते हैं। इसलिए हर वोटर जल्दी-जल्दी किस्म किस्म के चुनाव चाहता है। ताकि तोहफों की बरसात हो सके और चुनाव आए तो तोहफें तोहफें ही टपक पड़े ।और राजनीतिक पार्टियों तोहफों के संबंध में वोटर से यह पूछे की
,घोषणा पत्र के तोहफे में क्या चाहिए तुम्हें !
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