शोक सभा में जाने की कला: बाब्बन चाचा की फील्ड ट्रेनिंग

शोक व्यक्त करने जाना ,यह कोई शौक का विषय नहीं है मित्र l शोक-संवेदना व्यक्त करने के लिए किसी के घर जाना और वहाँ बैठकर संवेदनाएँ उँडेलना अत्यंत श्रमसाध्य कार्य है। आप दाह संस्कार में शामिल नहीं हो पाए,कुछ मजबूरियाँ आ पड़ीं। चलिए, इंसान हैं, हो जाता है। फिर आपको तेरहवीं में जाने का अवसर मिला,वह भी आपने अपने व्यस्त कार्यक्रम की बलि चढ़ा दिया। अब मामला थोड़ा संवेदनशील हो जाता है,“मजबूरी” धीरे-धीरे “लापरवाही” में बदलने लगती है और पड़ोसियों के मन में आपका सामाजिक क्रेडिट स्कोर गिरने लगता है।

समूह में जाना आसान होता है। वहाँ आप भीड़ के सहारे दुखी हो लेते हैं,चेहरा लटकाइए, दो बार “ओह…” कहिए, और भीड़ आपको धक्का देकर पुष्प अर्पण करवा देगी। बाहर निकलते ही आप शोक-संतप्त चेहरा बनाकर, हाथ जोड़कर, दरवाज़े पर खड़े दिवंगत के परिजनों को अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं। लेकिन अकेले जाना,यह किसी UPSC के इंटरव्यू से कम नहीं। वहाँ सामने आपके चेहरे-मोहरे, बोलचाल, हावभाव,सब कुछ संवेदना की कसौटी पर तौला जाता है।

सबसे पहली चुनौती,समय की है।
ऐसा नहीं कि बीस दिन बाद पहुँच जाएँ और सामने वाला भूल ही जाए कि “ये उसकी दिवंगत माँ की शोक सभा में आए हैं।” हो सकता है घर में अब सामने वाले के भतीजे की शादी के कार्ड बँट रहे हों और आप वहाँ दुख का डेमो देने पहुँच जाएँ। इसलिए नियम नंबर एक,दस दिन के भीतर संवेदना निपटा लें। शोक भी अब सरकारी फाइल की तरह टाइम-लिमिट में चलता है।

फिर आता है शुभ-अशुभ का गणित। शोक में भी पंचांग का पूरा सम्मान होता है। गुरुवार को मत जाइए,उस दिन बैठना अशुभ है। सुबह जाइए,दो बजे तक ‘सूतक स्लॉट’ खुला रहता है। ऐसा न हो कि शाम को पहुँचें और पता चले कि आज की शोक-सेवा का बोरिया-बिस्तर समेटा जा चुका है,कृपया कल आएँ।

अब सबसे बड़ा संकट,वहाँ जाकर बोलें क्या?
यहीं पर बाब्बन चाचा जैसे अनुभवी “शोक-संवेदना के फुलटॉस मास्टर ब्लास्टर” काम आते हैं। बाब्बन चाचा बहुउद्देशीय व्यक्ति हैं,शादी में बाराती, शोक में संवेदनाकार, और बीच-बीच में समाज सुधारक। सब नावों पर पैर पसारकर रखते हैं। और शोक में बैठने के लिए तो निमंत्रण की आवश्यकता होती ही नहीं,वे स्वयंभू प्रतिनिधि हैं।

हम भी चाचा को साथ लेकर पहुँचे।
चाचा ने प्रवेश करते ही कहा,“बहुत बुरा हुआ साहब…”
अधिकारी का चेहरा और लटक गया। उन्होंने पूरे घटनाक्रम की घिसी-पिटी कैसेट रिवाइंड करके सुनानी शुरू की,“सब कुछ ठीक था… सुबह घूमकर आते थे… नातिन की शादी की तैयारी खुद कर रहे थे… अचानक सात दिन पहले सीने में दर्द उठा…”

इससे पहले कि कैसेट पूरी चलती, मैंने चाचा को कोहनी मारी।
चाचा बीच में ही कूद पड़े,“अच्छा… क्या उमर पाई थी?”
“93 साल…” अधिकारी ने जैसे-तैसे इस अप्रत्याशित रूकावट पर असहज होते हुए बताया।

चाचा तुरंत सक्रिय,“अरे यह भी कोई उमर होती है जाने की! मेरे दादाजी 95 तक चले थे… खूब चले… इच्छा मृत्यु पाई उन्होंने तो… एक दिन खुद बोले,अब बहुत हुआ, अब चलना चाहिए… और बस चल दिए…”
जमाना पहले का था साहब,आदमी जाने की उम्र में भी खुद चलकर दाह स्थल तक जाता था,चार लोगों की जरूरत ही नहीं पड़ती थी!”

बाब्बन चाचा का यह ओवरकॉन्फिडेंस मुझे भीतर से असहज कर रहा था।

फिर चाचा ने याददाश्त का तीर चलाया,“पाँच दिन पहले ही तो बाजार में मिले थे…”
अधिकारी आश्चर्य से,“वो तो दो महीने से गाँव में थे… और गुजरे सात दिन हो गए…”

चाचा ज़रा भी विचलित नहीं हुए,“अरे आजकल बुढ़ापे में सबकी शक्लें एक जैसी हो जाती हैं… हो सकता है मैंने किसी और के बाप को देख लिया हो…”

अब यह चाचा पर निर्भर करता है कि बातचीत का रुख किस दिशा में मोड़ें। चाहें तो वे यह भी दावा कर सकते थे कि उन्होंने दिवंगत की आत्मा के दर्शन किए हैं,क्योंकि इस प्रकार के विशेष चक्षु उन्हें प्राप्त हैं। वे पंडित जी का नंबर देकर शांति पाठ का पूरा पैकेज भी सुझा सकते थे। लेकिन अधिकारी को यह अवसर उन्होंने नहीं दिया।

अधिकारी भी थोड़ा निराश लगे,शायद वे दिवंगत की वसीयत के कागजों या अंतिम इच्छा पर चर्चा करना चाहते थे, पर बाब्बन चाचा ने बातचीत को उस दिशा में जाने ही नहीं दिया।

इतने में चाय का प्रस्ताव आया।
मैंने कहा,“रहने दीजिए…बस सिर्फ पानी चलेगा ”
चाचा बीच में ही बोले,“अगर चाय बन रही हो तो मीठा मत डालिए…”

शोक सभा में भी डाइट कंट्रोल,यह आत्मविश्वास हर किसी के बस की बात नहीं। चाय आई और संवेदना दस मिनट और खिंच गई। चाय गजब की साइलेंस ब्रेकर साबित हुई,बात दिवंगत की चाय पीने की आदत से शुरू होकर चाय की दुकान, चायवाले, और वहाँ से प्रधानमंत्री तक पहुँच गई।

चाचा ने बात का पैंतरा बदला,
“गाँव में भाई रहते हैं?”
“हाँ, दो भाई हैं।”
“मकान-जायदाद?”
“पुश्तैनी हवेली… दोनों हाइयों के  के अलग मकान हैं … जमीन साझी है …”

चाचा ने भावुक होकर कहा,“आजकल कहाँ मिलते हैं ऐसे सुलझे रिश्ते… भाई-भाई में इतना प्रेम…”
अधिकारी के दुखते रग पर हाथ पड़ गया  हो जैसे ,“कोर्ट केस चल रहा है… बहुत पहले बंटवारा हो जाना चाहिए था… पिताजी जाते-जाते भी वसीयत लिखकर नहीं गए…”

चाचा कुछ और कहते, इससे पहले मैंने स्थिति को भांपकर उन्हें चुप कराया।

तभी एक युवा लड़का चाय लेकर आया,अधिकारी का बेटा।
चाचा ने आशीर्वाद दिया,“क्या करता है?”
“डॉक्टरी।”
“बहुत बढ़िया! हमारे पड़ोस में रिश्ता है… बेटी भी डॉक्टर है… बताइए तो बात चलाएँ…”

शोक सभा अब धीरे-धीरे विवाह सम्मेलन में परिवर्तित हो रही थी। दुख की राख से संबंधों की चिंगारी निकालने की यह कला भी बाब्बन चाचा के पास ही थी।

फिर चाचा वॉशरूम के बहाने निरीक्षण कर आए,पूरे मकान का नक्शा लेकर लौटे,
“प्लास्टर झड़ रहा है… पुट्टी वाला मेरा जानकार है… नंबर नोट कर लो…”

अब अधिकारी का चेहरा ऐसा हो गया था कि समझ नहीं आ रहा था,वे शोक में हैं या शॉक में।

जब उन्होंने बार-बार घड़ी देखनी शुरू की, तो मुझे लगा कि अब हमारी संवेदनाएँ ओवरडोज़ में जा सकती हैं। मैंने चाचा को संकेत दिया और हम वहाँ से ऐसे निकले जैसे कोई मरीज डॉक्टर की फीस दिए बिना भागता है,और पीछे मुड़कर देखने की हिम्मत भी नहीं करता।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

Comments ( 0)

Join the conversation and share your thoughts

No comments yet

Be the first to share your thoughts!