प्रमोशन के साथ ट्रान्सफर और वह भी प्रदेश की राजधानी में। अमूमन सरकारी अधिकारी/कर्मचारी राजधानी में रहने केलिए ज़िन्दगी भर तरसता रहता हैं पर मेरा वहां कैसे हो गया समझ से परे था। हालांकि मेरे लिए तो सजानुमा सा था। एक प्राकृतिक बसावट वाले नगर से सीधे कंक्रीट से भरें जंगल- महानगर में। नौकरी करनी थी सो जयपुर जाना हुआं। कॉलेज क्या था समुद्र सा था। हर कैटेगरी की दुगुनी भर्ती। इतने ही और प्रवेश के लिए लाइन में खड़े थे। एक-दूसरे को धक्का देने के लिए सभी कमर कसे हुए थे, जैसे राजधानी में तनख्वाह के बदले हीरे-जवाहरात मिलते हो।
एक दिन एक एल्कार को डांट पिलादी तो प्राचार्य महोदय ने बड़े मान सम्मान से मुझे चाय पिलाने के साथ सलाह दी – “यहां हर शख्स सिफारिश की वजह टिका हुआ है यानि सभी बड़े रिसोर्स फुल है।”
मैं (भोंहे तरेर कर) – सेलेरी लेते हैं काम तो करना होगा सर। मेरा क्या बिगाड़ेंगे। वैसे ही मैं तो घर से दूर बैठा हूं। थोड़ा और इधर उधर सही। असि की फ़र्क पेन्दा। आप मेरी ओर से निश्चिंत रहें।
प्राचार्य (अपने पन के साथ)- अरें श्रीमान! आपका नहीं, मेरा बिगड़ेगा। इस बुढ़ापे में कहां जाऊंगा? मेरा ख्याल रखिए। याद रखिए चाकू और खरबूजे में, खरबूजे को ही कटते देखा है। चाकू का कुछ नहीं बिगड़ता।
सलाह की पोटली को सिर पर धारण कर, प्राचार्य महोदय के प्रति दिल में दयाभाव लिए उनके कक्ष से बाहर आ गया।
प्रवक्ता द्वय राम अवतार व राम खिलावन एक बारगी सुबह मिल लेते थे, फिर जाते वक्त शाम की सलाम। मध्यान्ह काल के आसपास हमेशा ग़ायब। हां- टाइम-टेबल के अनुसार कक्षा को सम्हालने, पढ़ाने में बड़े माहिर थे। पर बस अपना कार्य और किसी एक्स्ट्रा वर्क केलिए स्पष्ट नोप। बहाने बनाने में भी जुगल जोड़ी मशहूर थी। हर किसी को एक्स्ट्रा मान सम्मान देकर अपनी मनमानी करना उनका फितुर बन गया था।
आखिर विभागाध्यक्ष के नाते उनकी क्लास ले ही ली। प्राचार्य महोदय की सलाह को सम्मुख शिरोधार्य रख प्रेम से पूछ ही लिया कि हर दोपहर के दो-तीन घंटे कहां जाते हो! हमें भी बताएं। प्रश्नों की झड़ी से आखिर दोनों टूट गये।
राम खिलावन – साहब! शेयर मार्केट जाते हैं। दो पैसे की कमाई करने केलिए।
रामअवतार – सोचते हैं कि तनख्वाह से तो जयपुर में घर बनने से रहा,जब तक ऊपरी इन्कम न हो जयपुर में निभाव मुश्किल है।
मैंने पूछा – सट्टा लगाते हो या इन्वेस्टमेंट?
राम खिलावन – इन्वेस्टमेंट केलिए रुपए कहां पड़े सर? उसके लिए मोटी रकम के साथ समय चाहिए। एफ एण्ड ओ से ही काम चलाते हैं।
रामअवतार – अपना फार्मूला है सर, बकरी लाई और ब्याई। यानि फटाफट, ऐसा चाहिए। ये शेयर बाजार से ही संभव है।
“कितना कमा लेते हों?” मेरा सवाल था।
दोनों ही एक स्वर में (उपरी जोश के साथ)- “नफा साले मुम्बई में जो बैठे है वो खाते हैं। यहां क्या है, मिलते हैं- टिंडे।
(मुंह लटका कर) कुल मिलाकर घाटा ही हुआ है। उल्टे घर से रकम दी है।”
जब मैंने अपने को शेयर मार्केट का खिलाड़ी बताया तो चमक उठे। चेहरे पर असलियत वाली मासूमियत आ गई।
कहने लगे, सर- किसी दिन तो दो-तीन हजार मिल जाते तो दूसरे दिन ही उससे ज्यादा रकम डूब जातीं हैं। कई तो वहां स्साले धड़ाधड़ कमाते हैं परन्तु अपने हिस्से में फूटी कौड़ियां लिखीं हैं।
मैंने समझाते कहा- शेयर मार्केट में समझ के खेलिए। बहुत कठिन है ये कमाई का रास्ता। दिखता कुछ और होता कुछ और।
(गंभीर होकर) एफ एण्ड ओ में काम करते हो तो मेरी सलाह यह है कि एक जना बेचें तो दूसरा खरीदें। इससे कम से कम एक को तो फायदा होगा ही। अगले दिन उलट देना।
दोनों बड़े खुश हुए। सलाह केलिए बार-बार धन्यवाद दिया। हाथों हाथ कैंटीन से समोसे ले आये।
अगले दिन फिर मुलाकात हुई। पूछा क्या रहा। कितना नफा हुआ?
रूआसें हो दोनों ही बोल पड़े – यही कहने आ रहे थे साहब। पहले इसके घाटा हुआ और मुझे नफा हो रहा था। मैंने प्रोफिट बुक किया नहीं और फिर मुझे भी नुकसान हाथ लगा।
मैं (बनावटी गुस्से से)- दोनों ही करम ठोक हो। तुम दोनों की किस्मत में लिखा है कि कॉलेज के बच्चों को एक तरह फ्री में पढ़ाना। सरकार की दी गई सैलेरी को इसी तरह से पुनः वसूल की जा रही है। इसको कहते हैं एक हाथ दे और दूसरे हाथ ले। अब समझ लो आगे कैसे रहना है!
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डॉ मुकेश 'असीमित'
2 minutes agoराजधानी में तबादले, सरकारी नौकरी, शेयर बाजार और एफ एंड ओ के चक्कर में फँसे दो प्रवक्ताओं की हास्यपूर्ण कहानी। पढ़िए डॉ. राम कुमार जोशी का व्यंग्य "कर्म ठोक", जिसमें किस्मत, लालच और सरकारी व्यवस्था पर तीखा कटाक्ष है।