कैसे चुप रहूँ मैं – देशभक्ति एवं जनचेतना गीत

“कैसे चुप रहूँ मैं” एक शक्तिशाली देशभक्ति, जनचेतना और सामाजिक व्यंग्य से भरपूर गीत है, जो अन्याय, भ्रष्टाचार, शोषण और मौन के विरुद्ध आवाज़ उठाने की प्रेरणा देता है।
यह गीत हर उस भारतीय की भावना है, जो अपने देश, समाज और सत्य के लिए बोलना चाहता है।

इस गीत में क्रांति की पुकार है, जनमन की वेदना है, और बदलाव का संकल्प है।
अगर आपको यह प्रस्तुति पसंद आए, तो कृपया Like, Share, Comment और Subscribe अवश्य करें।

Lyrics: Dr Mukesh Aseemit
Composed on AI Music Platform
Theme: Patriotic / Revolutionary / Social Satire
Mood: Angry, Powerful, Emotional, Inspiring
कैसे चुप रहूँ मैं

देशभक्ति जनचेतना सामाजिक व्यंग्य क्रांतिकारी गीत

YouTube पर गीत सुनें:

जय हिन्द!

[भूमिका / उद्घोष]

जब सच की आवाज़ दबाई जाए,
जब झूठ को ताज पहनाया जाए,
जब देश का रखवाला ही
देश का सौदा करने लगे—
तो बोलो…
कैसे चुप रहूँ मैं?


[मुखड़ा / Chorus]

जब देश मेरा लुटता हो,
कैसे चुप रहूँ मैं?
जब सत्य अकेला लड़ता हो,
कैसे चुप रहूँ मैं?

मेरी रग-रग में हिंदुस्तान,
मेरी साँसों में उसका सम्मान ,
जब मातृभूमि पुकारे तो—
कैसे चुप रहूँ मैं?
कैसे चुप रहूँ मैं?


[अंतरा–1]

वे भूख के हिस्से खाते हैं,
फिर सेवा का दम भरते हैं,
वे भूख के हिस्से खाते हैं,
फिर सेवा का दम भरते हैं।

जनता के टूटे सपनों पर,
अपने महलों को गढ़ते हैं।
जब आँसू बिकते बाज़ारों में,
कैसे सुख से रहूँ मैं?

जब देश मेरा लुटता हो,
कैसे चुप रहूँ मैं?
जब सत्य अकेला लड़ता हो,
कैसे चुप रहूँ मैं?


[अंतरा–2]

ये मिट्टी केवल मिट्टी नहीं,
वीरों की अमर निशानी है,
ये मिट्टी केवल मिट्टी नहीं,
वीरों की अमर निशानी है।

हर कण में भगत, सुभाष बसे,
हर बूँद में झाँसी रानी है।
जब उनके त्याग पे दाग लगे,
कैसे सब कुछ सहूँ मैं?

मेरी रग-रग में हिंदुस्तान,
मेरी साँसों में उसका सम्मान ,
जब मातृभूमि पुकारे तो—
कैसे चुप रहूँ मैं?


[अंतरा–3 : सामाजिक व्यंग्य]

कुर्सी के सौदागर देखो,
हर रंग में खुद को ढाल रहे,
कुर्सी के सौदागर देखो,
हर रंग में खुद को ढाल रहे।

कल जिनको चोर बताया था,
आज बाँट उन्ही से माल रहे।
जब नीति रोज़ बदलती हो,
कैसे उन पर यक़ीं करूँ मैं?

जब झूठ मंच पर हँसता हो,
कैसे चुप रहूँ मैं?
जब सच सलाखों में सड़ता हो,
कैसे चुप रहूँ मैं?


[अंतरा–4]

किसान की सूनी आँखों में,
अब भी कुछ सपने ज़िंदा हैं,
मज़दूर के छाले कहते हैं,
हम मेहनतकश शर्मिंदा हैं?

जो हाथ बनाते भारत को,
वे हाथ ही क्यों मजबूर रहें?
जब श्रम की कीमत घटती हो,
कैसे मौन रहूँ मैं?

जब भूखा बच्चा सोता हो,
कैसे चुप रहूँ मैं?
जब अन्न गोदामों में सड़ता हो,
कैसे चुप रहूँ मैं?


[Bridge / उत्कर्ष]

मेरी धड़कन में गंगा है,
मेरे माथे पर चंदन है,
मेरे भीतर जलता हर पल
आज़ादी का आंदोलन है।

न तलवार उठानी है हमको,
न हिंसा की दीवार बने,
सच हाथ में लेकर निकलें तो,
हर सोया मन अंगार बने!

अब डर के आगे झुकना क्या?
अब पीछे पाँव हटाना  क्यों?
जब देश मुझे आवाज़ दे—
फिर पीछे मुड जाना  क्यों !


[मुखड़ा सामूहिक कोरस]

जब देश मेरा लुटता हो,
कैसे चुप रहूँ मैं?
जब सत्य अकेला लड़ता हो,
कैसे चुप रहूँ मैं?

मेरी रग-रग में हिंदुस्तान,
मेरी साँसों में उसका सम्मान ,
जब मातृभूमि पुकारे तो—
कैसे चुप रहूँ मैं?


[अंतरा–5 : प्रेरक आह्वान]

तुम दीप जलाओ गलियों में,
मैं सच की मशाल उठाता हूँ,
तुम दीप जलाओ गलियों में,
मैं सच की मशाल उठाता हूँ।

जो सोए हैं उनको जगाने को,
जन-जन के द्वार मैं जाता हूँ।
एक आवाज़ अकेली क्या—
लाखों स्वर साथ मिलाएँगे,
जो आज सवाल उठेंगे तो,
कल नया सवेरा लाएँगे।


[Final Chorus / Grand Finale]

न देश बिके, न मान बिके,
न जन का स्वाभिमान बिके,
हम जागेंगे, हम बोलेंगे,
न संविधान का ज्ञान बिके।

जब न्याय कहीं भी रोता हो,
कैसे चुप रहूँ मैं?
जब भारत मुझसे कहता हो—
तब कैसे चुप रहूँ मैं?

मैं शब्द बनूँ, आवाज़ बनूँ,
जन-जन का विश्वास बनूँ,
जब मातृभूमि पुकारे तो—
मैं क्रांति का उद्घोष बनूँ!

कैसे चुप रहूँ मैं?
कैसे चुप रहूँ मैं?
अब चुप नहीं रहूँगा मैं!

[Outro / उद्घोष]

सत्य की जय!
जनता की जय!
भारत माता की जय!
जय हिन्द!

जय हिन्द!
जब देश, सत्य और स्वाभिमान की बात हो — चुप रहना संभव नहीं।
सुनिए मेरा नया देशभक्ति गीत: “कैसे चुप रहूँ मैं”।
जय हिन्द! 🇮🇳

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

Comments ( 0)

Join the conversation and share your thoughts

No comments yet

Be the first to share your thoughts!