Prem Chand Dwitiya
Jul 13, 2026
व्यंग रचनाएं
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क्यूआर कोड ने दुकानों, सब्जी मंडियों, टिकटों और भीख मांगने तक के तरीकों को बदल दिया है। लेकिन जब बाबू चाचा ने बेटे की शादी में लिफाफों की जगह उपहार काउंटर पर क्यूआर कोड लटका दिया, तब डिजिटल भुगतान ने विवाह की परंपराओं में भी शानदार प्रवेश कर लिया। आधुनिक तकनीक और सामाजिक व्यवहार पर रोचक हास्य-व्यंग्य।
Prem Chand Dwitiya
Jun 7, 2026
व्यंग रचनाएं
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क्या पुरुष सचमुच महिलाओं की उन्नति चाहते हैं या उनके भीतर कोई छिपा हुआ 'एआई एजेंडा' काम करता है? सुंदरता, आरक्षण, सामाजिक व्यवहार और पुरुष मानसिकता पर एक धारदार व्यंग्य।
Prem Chand Dwitiya
May 25, 2026
व्यंग रचनाएं
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जब सत्ता चली जाती है तो फूल भी कृत्रिम लगने लगते हैं। “पावरलेस बर्थडे के फूल” राजनीति, भीड़तंत्र, होर्डिंग संस्कृति और लोकतांत्रिक नौटंकी पर करारा हास्य-व्यंग्य प्रस्तुत करती है।
Prem Chand Dwitiya
May 19, 2026
व्यंग रचनाएं
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कॉकरोच बिरादरी पर सिस्टम पर हमले का आरोप लगते ही तिलचट्टों की आपात बैठक बुला ली गई। बैठक में वृद्ध, युवा, पर्यावरण प्रेमी और राजनीतिक चेतना से लैस कॉकरोचों ने मनुष्य जाति पर पलटवार किया। उनका सीधा सवाल था—हम तो किचन वेस्ट खाते हैं, जंगलों की तबाही झेलते हैं, मिट्टी को उर्वर बनाते हैं; असली निकृष्ट जीव कौन है?
Prem Chand Dwitiya
Apr 28, 2026
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यह व्यंग्य चुनावी तोहफों और फ्रीबीज राजनीति की उस विडंबना को उजागर करता है, जहाँ वादों की फेहरिस्त से जन्मे तोहफे मतदाताओं को लुभाते हैं और लोकतंत्र को एक अलग ही दिशा में ले जाते हैं।
Prem Chand Dwitiya
Apr 15, 2026
व्यंग रचनाएं
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भारतीय समाज में लाइन में लगना एक कला बन चुकी है—गैस सिलेंडर से लेकर ऑनलाइन बुकिंग तक। पढ़िए एक रोचक और तीखा व्यंग्य “लाइन में खड़े रहने का हुनर”।
Prem Chand Dwitiya
Apr 8, 2026
व्यंग रचनाएं
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रंग बदलने के पुराने उस्ताद गिरगिट भी आजकल इंसानों की रंगबाज़ी से हैरान हैं।
सुरक्षा के लिए रंग बदलने वाले जीव अब अपनी साख बचाने की बैठक कर रहे हैं।
व्यंग्य यह है कि बदनाम गिरगिट हैं, मगर रंग बदलने की असली महारत इंसानों ने हासिल कर ली है।
Prem Chand Dwitiya
Mar 29, 2026
व्यंग रचनाएं
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वैश्विक युद्ध की चिंगारी जब चूल्हे तक पहुँची, तो गैस सिलेंडर अचानक ‘राम रतन धन’ बन गया—और आम आदमी लाइन, लाचारी और व्यंग्य के बीच झूलता रह गया।
Prem Chand Dwitiya
Mar 16, 2026
व्यंग रचनाएं
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आज के सार्वजनिक जीवन में संवेदना भी एक सार्वजनिक प्रदर्शन बन गई है। किसी की पीड़ा कम हो या न हो, पर फोटो, पोस्ट और लाइक-शेयर की दुनिया में संवेदना का बाजार खूब गर्म है। यह व्यंग्य उसी विडंबना को पकड़ता है जहाँ असली वेदना से ज्यादा महत्व संवेदना की तस्वीरों को मिल जाता है।
Prem Chand Dwitiya
Mar 8, 2026
व्यंग रचनाएं
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कस्बे के अज्ञान चबूतरे पर जमा हुई यह होली की टोली केवल रंग-गुलाल का उत्सव नहीं, बल्कि ढलती उम्र के अकेलेपन, अनुभव और हास्य का संगम है। सेवानिवृत्त अधिकारी, प्रोफेसर, पंडित और पुराने मित्र — सब मिलकर होली के बहाने जीवन की त्रासदियों को ठिठोली में बदल देते हैं।