Prem Chand Dwitiya
Sep 4, 2026
व्यंग रचनाएं
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सोशल मीडिया के डिजिटल दरबारों ने घाघ-भड्डरी की लोक-कहावतों से लेकर मौसम विभाग तक सबको पीछे छोड़ दिया है। पढ़िए मौसम की ऑनलाइन भविष्यवाणियों और किसानों की उलझनों पर डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का चुटीला व्यंग्य।
Prem Chand Dwitiya
Aug 2, 2026
व्यंग रचनाएं
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जंतर-मंतर केवल आंदोलनों का ठिकाना नहीं, बल्कि लोकतंत्र का ऐसा जादुई मंच है जहाँ नारों की आवाज संसद तक पहुँचती है। यहाँ कुछ आंदोलन तंत्र को बदल देते हैं, तो कुछ स्वयं छूमंतर हो जाते हैं। कॉकरोच-पार्टी से लेकर तंतर, मंतर और टाइम-आउट तक—डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का रोचक राजनीतिक व्यंग्य।
Prem Chand Dwitiya
Jul 28, 2026
व्यंग रचनाएं
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लाफिंग क्लब के बाद अब क्राइंग क्लब! आधुनिक जीवन, अकेलेपन, आंसुओं और रोने की कला पर डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का रोचक हास्य-व्यंग्य।
Prem Chand Dwitiya
Jul 26, 2026
व्यंग रचनाएं
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बड़े बाबू से लेकर सोशल मीडिया के स्वयंभू विशेषज्ञों तक—यह व्यंग्य उन ‘ज्ञानचंदों’ पर करारा कटाक्ष है, जो बिना माँगे हर मौके पर राय, नुस्खे और सलाह बाँटते हैं।
Prem Chand Dwitiya
Jul 13, 2026
व्यंग रचनाएं
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क्यूआर कोड ने दुकानों, सब्जी मंडियों, टिकटों और भीख मांगने तक के तरीकों को बदल दिया है। लेकिन जब बाबू चाचा ने बेटे की शादी में लिफाफों की जगह उपहार काउंटर पर क्यूआर कोड लटका दिया, तब डिजिटल भुगतान ने विवाह की परंपराओं में भी शानदार प्रवेश कर लिया। आधुनिक तकनीक और सामाजिक व्यवहार पर रोचक हास्य-व्यंग्य।
Prem Chand Dwitiya
Jun 7, 2026
व्यंग रचनाएं
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क्या पुरुष सचमुच महिलाओं की उन्नति चाहते हैं या उनके भीतर कोई छिपा हुआ 'एआई एजेंडा' काम करता है? सुंदरता, आरक्षण, सामाजिक व्यवहार और पुरुष मानसिकता पर एक धारदार व्यंग्य।
Prem Chand Dwitiya
May 25, 2026
व्यंग रचनाएं
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जब सत्ता चली जाती है तो फूल भी कृत्रिम लगने लगते हैं। “पावरलेस बर्थडे के फूल” राजनीति, भीड़तंत्र, होर्डिंग संस्कृति और लोकतांत्रिक नौटंकी पर करारा हास्य-व्यंग्य प्रस्तुत करती है।
Prem Chand Dwitiya
May 19, 2026
व्यंग रचनाएं
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कॉकरोच बिरादरी पर सिस्टम पर हमले का आरोप लगते ही तिलचट्टों की आपात बैठक बुला ली गई। बैठक में वृद्ध, युवा, पर्यावरण प्रेमी और राजनीतिक चेतना से लैस कॉकरोचों ने मनुष्य जाति पर पलटवार किया। उनका सीधा सवाल था—हम तो किचन वेस्ट खाते हैं, जंगलों की तबाही झेलते हैं, मिट्टी को उर्वर बनाते हैं; असली निकृष्ट जीव कौन है?
Prem Chand Dwitiya
Apr 28, 2026
Blogs
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यह व्यंग्य चुनावी तोहफों और फ्रीबीज राजनीति की उस विडंबना को उजागर करता है, जहाँ वादों की फेहरिस्त से जन्मे तोहफे मतदाताओं को लुभाते हैं और लोकतंत्र को एक अलग ही दिशा में ले जाते हैं।
Prem Chand Dwitiya
Apr 15, 2026
व्यंग रचनाएं
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भारतीय समाज में लाइन में लगना एक कला बन चुकी है—गैस सिलेंडर से लेकर ऑनलाइन बुकिंग तक। पढ़िए एक रोचक और तीखा व्यंग्य “लाइन में खड़े रहने का हुनर”।