डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 4, 2026
कहानी
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सड़क चौड़ी करने की सरकारी मुहिम में एक टीन की छोटी दुकान उजड़ जाती है। उसके साथ बिखर जाते हैं एक विधवा माँ के सपने, दो पढ़े-लिखे बेरोज़गार बेटों की उम्मीदें और वर्षों की मेहनत। यह व्यंग्य विकास के नाम पर होने वाले मानवीय विस्थापन की संवेदनशील पड़ताल है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 8, 2026
व्यंग रचनाएं
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शोक सभा में जाना भी एक सामाजिक परीक्षा है। बाब्बन चाचा इस परीक्षा में इतने अनुभवी हैं कि संवेदना व्यक्त करते-करते रिश्ता, पुट्टी और प्रॉपर्टी तक की चर्चा छेड़ देते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 27, 2026
Culture
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क्या राम केवल एक ऐतिहासिक पात्र हैं या हमारे भीतर की एक चेतना? यह लेख राम को देह से तत्व तक समझने की एक गहन यात्रा है, जो बताता है कि राम किसी धर्म तक सीमित नहीं बल्कि मानवता की सर्वोच्च संवेदनशील अवस्था हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 20, 2026
Self Help and Improvements
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शिक्षा विनम्र बनाती है — या हमने शिक्षा को ही छोटा कर दिया है? कहा जाता है—जितना आप शिक्षित होते हैं, उतना ही विनम्र, संवेदनशील और समझदार बनते हैं। शिक्षा केवल डिग्री का नाम नहीं, वह दृष्टि का विस्तार है। वह भीतर का अहंकार गलाकर मनुष्य को मनुष्य बनाती है। लेकिन प्रश्न यह है कि […]
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 6, 2026
आलोचना ,समीक्षा
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सम्यक ज्ञान का अर्थ अधिक जानना नहीं, बल्कि सही ढंग से देख पाना है।
जहाँ शास्त्रार्थ समाप्त होकर अनुभूति शुरू होती है, वहीं से सच्चे विमर्श की यात्रा आरंभ होती है।
यह लेख ज्ञान, कविता, करुणा और चेतना के उसी संतुलन बिंदु की खोज है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 27, 2025
India Story \बात अपने देश की
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यह साल किसी कैलेंडर की तरह नहीं बीता, बल्कि अधूरी डायरी की तरह—जहाँ स्याही कम और धड़कन ज़्यादा थी। घटनाएँ बदलीं, लेकिन उनसे ज़्यादा बदले हमारे डर, ग़ुस्सा और चुप्पियाँ।
यह साल हमें किसी नतीजे तक नहीं लाया, बल्कि सवालों की लंबी सूची सौंप गया—कि हम क्या सोचते हैं, कैसे सोचते हैं और कब चुप रहते हैं।
आतंक, युद्ध, आस्था, कॉमेडी, सोशल मीडिया—हर मोर्चे पर यह साल हमें भीतर तक झकझोरता रहा। इतिहास बनता रहा, और हम बदलते रहे।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 20, 2025
Poems
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भाषा और मेरा रिश्ता महज़ शब्दों का नहीं, स्मृतियों, संवेदनाओं और सांसों का जीवित संगम है। यह कभी जेब में रखी पुरानी चिट्ठी की तरह महकती है, कभी अँधेरे में लालटेन बन जाती है। भाषा मेरे लिए दिशा है, धड़कन है, और दिन-रात साथ बहती आत्मा का संगीत।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 15, 2025
हिंदी कविता
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एक धनाढ्य व्यक्ति, जिसने माँ के लिए महल जैसा घर बनाया था, आज बेसुध विलाप कर रहा है। माँ की हल्की करवट पर जाग जाने वाली वही माँ, महल की ऊँची दीवारों में पुकारते-पुकारते खो गई। उसकी पीड़ा यही थी—“काश ये दीवारें बोल उठतीं।” यह कहानी महज़ शोक नहीं, आधुनिक सुविधाओं में खोई मानवीय संवेदनाओं और मौन की त्रासदी का सजीव प्रतीक है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 16, 2025
हिंदी लेख
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महर्षि वाल्मीकि और क्रौंच पक्षी का ऐतिहासिक प्रसंग
संस्कृत साहित्य में भावनात्मक संवेदना का महत्व
कालिदास की काव्य कृतियों का मूल्य और समकालीन साहित्य
साहित्य का उद्देश्य और संवेदनशीलता