मुख्य अतिथि बनने की राह – बड़े धोखे हैं इन राहों में

मुख्य अतिथि बनने की राह – बड़े धोखे हैं इन राहों में

मित्रों, वैसे तो इस जिंदगी में हम सब अतिथि बनकर ही आए हैं,दो दिन के अतिथि जी! लेकिन शायद चार दिन की जिंदगी इसलिए मिली है कि दो दिन अतिथि बनकर काटें और अगर भाग्य ने साथ दे दिया तो बाकी दो दिन मुख्य अतिथि बनकर… तब तो समझिए इहलोक भी तर गया और शायद परलोक में भी आपकी ‘काबिलियत’ का वजन बढ़ जाए, और वहाँ भी किसी देवसभा में मुख्य अतिथि की कुर्सी हथिया लें।

लेकिन राह आसान नहीं है,यह आप भी जानते हैं। बड़े तप-तपस्या लगते हैं इसमें। “बड़े भाग मानुष तन पावा”,पर यह तन ‘माननीय’ तब बनता है जब आप किसी कार्यक्रम में मुख्य अतिथि हो जाएँ। अब शहर में संस्थाएँ कुकुरमुत्तों की तरह उग आई हैं, तो जाहिर है कि उनमें मुख्य अतिथि भी खपने हैं। पहले एक ही मुख्य अतिथि दिन के दो-चार कार्यक्रम निपटा देता था, लेकिन अब हर संस्था को अपना ‘एक्सक्लूसिव’ मुख्य अतिथि चाहिए। पुराने वाले इतने अनुभवी हो गए हैं कि बिना दान-दक्षिणा के कुर्सी पर कब्जा जमाना चाहते हैं,इसलिए नए चेहरों की तलाश जारी रहती है।

हमने भी इस कुर्सी की बड़ी लालसा पाल रखी है। कई बार संस्थाओं के पदाधिकारी हमें निमंत्रण देकर मुख्य अतिथि बनने का लाइव डेमो दिखाते हैं,मार्केटिंग गुरु की तरह। हमें आगे बिठाते हैं, कुर्सी के सब्जबाग दिखाते हैं। उनकी नजरें किसी एम् एल एम् एजेंट की तरह कहती हैं,“बस दो कदम दूर है कुर्सी महोदय… देख क्या रहे हैं? यह कुर्सी आपकी भी हो सकती है!” आयोजकों की हड़बड़ाहट में कई बार मैंने खुद को विकल्प के रूप में प्रस्तुत भी किया, लेकिन उनके निर्णय लेने की धीमी गति ने हर बार मौका हाथ से निकलवा दिया,क्योंकि ऐन वक्त पर ‘निर्धारित’ मुख्य अतिथि टपक ही जाते हैं।

खूब देखा है  हमने संस्थाओं में मुख अतिथियो  को दूल्हे की तरह शहीद  होते हुए  ,खुद दूल्हा नहीं बने तो क्या, बारातें तो अटेंड की ही हैं! हमारे शहर के स्थायी 24×7 उपलब्ध मुख्य अतिथि तो जैसे जन्म ही लिए हैं फीता काटने के लिए। उनका व्यक्तित्व देखकर लगता है कि वे पैदा ही कैंची पकड़कर हुए होंगे। कैंची उनके हाथ में ऐसी शोभा देती है जैसे अर्जुन के हाथ में गांडीव। वे हर बात पर मुस्कराते हैं,ऐसी मुस्कान की धार  कि भींचे होंठों के बीच से भी फूट ही पड़े ।

मुख्य अतिथि की भी अपनी मजबूरियाँ होती हैं। उसे हर हाल में प्रसन्न दिखना पड़ता है। बच्चों ने बेसुरा स्वागत गीत गाया,मुख्य अतिथि प्रसन्न। माइक ने धोखा दे दिया,फिर भी मुस्कराना पड़ेगा। माला में गेंदे के फूलों के साथ दो चींटियाँ भी गले को काट लें,तो भी। सम्मान-पत्र में नाम गलत छप जाए,‘कुकरेजा’ की जगह ‘फुकरेजा’,तो भी। क्योंकि मुख्य अतिथि का दुख निजी होता है और उसकी मुस्कान सार्वजनिक।

दरअसल, मुख्य अतिथि बनना कठपुतली बनने का सभ्य संस्करण है। आयोजकों के इशारों पर नाचना पड़ता है,“अब दीप प्रज्वलित कीजिए… अब माल्यार्पण स्वीकार कीजिए… अब दो शब्द कहिए…” वाह जी! इक्कीस हजार के दान में इक्कीस हजार शब्द बोलने की भी इजाजत नहीं। आदमी अपने ही भाषण का श्राद्ध करके बैठ जाता है।

यह तो तय है कि मुख्य अतिथि बनने के लिए केवल विद्वान, समाजसेवी, साहित्यकार या वरिष्ठ होना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए सबसे पहले आयोजन समिति की कृपा चाहिए। समिति चाहे तो पत्थर को भी प्रेरणास्रोत घोषित कर दे, और न चाहे तो जीवित प्रतिभा को दर्शक दीर्घा की तीसरी पंक्ति में बिठाकर पानी की बोतल पकड़ा दे।

एक बार हमें ‘मुख्य अतिथि इन वेटिंग’ का निमंत्रण भी मिला। आयोजकों ने पूरी ढिठाई से बताया कि कार्ड छप चुके हैं, उसमें हमारा नाम नहीं है। ऐन वक्त पर मुख्य अतिथि की माँ का देहांत’ हो गया था,उन्हें  इस निजी शोकसभा में जाना था, इसलिए असमर्थता जता दी। यह सारी बातें उन्होंने इतनी सहजता से सुनाईं कि हमारी औकात का पूरा बोध हो गया। लेकिन हम भी मुख्य अतिथि की लालसा में जीभ लपलपाए बैठे थे,सोचा, चलो इस बार मुख्य अतिथि पद की ‘उतरन’ ही सही। माला गर्दन तक आएगी, यही क्या कम है! भाषण की रूपरेखा मन में बनने लगी। पत्नी को भी हल्का-सा संकेत दे दिया,“शाम को प्रेस नोट में नाम आ सकता है।”

शादी का कोट निकलवाकर धुलवाया, प्रेस करवाया,वैसे मुख्य अतिथि की निर्धारित  फॉर्मल ड्रेस हमने आखिरी बार स्कूल के ‘विचित्र वेशभूषा’ प्रतियोगिता में ही   पहनी थी।

कहते हैं,तेरे आर मेनी स्लिप्स बिटवीन कप्स एंड लिप्स … अभी प्याला अधर तक आया ही था कि डर लगने लगा,कहीं ऐसा न हो कि स्थायी मुख्य अतिथि जी की माँ पुनर्जीवित हो जाए और उनका शोकसभा में जाना टल जाए। ऐसे में… हमारी यह क्षणिक मुख्य अतिथि-लीला भी समाप्त!

सोचकर ही डर लगता है… ये राहें सचमुच बड़ी धोखेबाज़ हैं!

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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