पार्टी अध्यक्ष का विलाप-कुर्सी, विश्वासघात और लोकतंत्र का तमाशा

पार्टी अध्यक्ष का विलाप

मंच सूना है, माइक उदास है, और अध्यक्ष महोदय का चेहरा लुटा-पिटा सा,जैसा इस स्थिति में हो सकता है, वैसा ही है। उन्हें धोखा दे दिया गया… दरअसल धोखे पर उनका कॉपीराइट था, और कल उनका ही पाला-पोसा पार्टी सांसद दूसरी पार्टी में जाकर मिल जाए,ऐसा धोखा… वो सोच भी नहीं सकते थे। लोकतंत्र में लोक को तो जुमलों के तंत्र-मंत्र और वायदों के जादू-टोने से मंत्रमुग्ध किया जा सकता है, लेकिन अपनी ही पार्टी के मेंबर का क्या करें…

सामने खाली कुर्सी को निहारते हुए वे कराह रहे हैं… रह-रह के याद कर रहे हैं वो मंजर, जब जनता को पागल बनाने में दोनों ने मिलकर एड़ी-चोटी का जोर लगाया था,
“ये अच्छा नहीं किया तूने… अब किसका रास्ता देखूं? अरे कम से कम जाते-जाते इतना तो बता देता कि जा रहा हूँ! हम भी तेरे विदाई समारोह  में कुछ मार-कुटाई का इंतजाम कर लेते!”

अध्यक्ष जी की आवाज़ में भविष्य को लेकर आशंका युक्त कंपन है,
“मुझे शुरू से ही शक था इस पर… इसलिए तो मैंने इस पर ‘विशेष नज़र’ रखवाई थी। पर ये तो नज़र बचाकर ही निकल गया। मुझे क्या पता था ये किसी और से नज़रें चार कर बैठा..!”

वे कुर्सी के हत्थे को सहलाते हैं, एक वितृष्णा-सी हो गई है मन में,
“क्या चार पैसे घर में आने लगे तो पार्टी के लोग जलने लगे हैं… हिस्सेदारी मांगने लगे हैं!”

“देखो भाई, पार्टी कोई सराय नहीं है कि आए, चाय पिए, और दूसरी गली से निकल जाए! ये तो परिवार है… जनता के खून-पसीने से सींचा है मैंने इसको।”

थोड़ा रुककर वे गहरी सांस लेते हैं,
“मुझे बस एक ही दुख है… बिना कुटे चला गया। मैंने तो पूरी तैयारी कर रखी थी,झूठे तथ्यों की, तर्कों की, और अगर ज़रूरत पड़ती तो टेबल के नीचे रखे जूते भी तैयार थे! लेकिन जनाब आए ही नहीं। लगता है इनको भनक लग गई थी कि जरूर इसके जासूस हमारी पार्टी में और भी हैं… सबको निकालना पड़ेगा… अकेला ही चला था, अकेला ही चलूंगा।”

अब उनका स्वर शिकायत से ज्यादा अधिकारपूर्ण हो जाता है,
“कहता था,‘अध्यक्ष जी, मेरा हिस्सा दीजिए।’
अरे भाई! हिस्सा कोई समोसा है क्या, जो आधा-आधा बाँट दें? यहाँ तो हर तिनके पर मेरा नाम लिखा है,झंडा मेरा तो झंडे का डंडा भी मेरा!”

वे अचानक भावुक हो उठते हैं,
“हमने इसे क्या नहीं सिखाया? देश से कैसे ‘मतभेद’ रखना है, और ज़रूरत पड़े तो उसे ‘गद्दारी’ में कैसे अपग्रेड करना है,सब कुछ सिखाया! और आज वही हमें राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाने चला है। अरे, पहले पार्टी-भक्ति तो सीख लेता ढंग से, करमजले!”

भीड़ में बैठे चापलूसों की आँखें भी नम हो रही हैं,कुछ भविष्य की चिंता में ज्यादा ही भावुक हो गए हैं।

अध्यक्ष जी फिर से गरजते हैं,
“हीरो बनता फिरता है वहाँ… लेकिन हमारे लिए तो विलेन ही रहेगा। कम से कम जाते-जाते बोल तो देता,‘अध्यक्ष जी, मैं जा रहा हूँ।’ ये अच्छा नहीं किया तूने…
अरे हमसे पूछकर जाता… हम खुद ही इंतजाम कर देते जाने का… कम से कम दो-चार घोटालों को अपने नाम करा जाता, पाप के घड़े जो भरे उन्हें हमरे ही माथे फोड़ गया रे दुष्ट !”

अब वे दार्शनिक हो जाते हैं,
“ये दुनिया बड़ी बेगानी है दोस्तों… आज जो तिनका मेरे झाड़ू में था, वो उड़कर किसी और के झाड़ू में जा बैठा। कल वो तिनका भी उड़ जाएगा… क्योंकि तिनकों की फितरत ही उड़ना है, और नेताओं की फितरत,उन्हें पकड़कर रखना।”

अंत में वे आकाश की ओर देखते हैं, जैसे ऊपर बैठे ‘आका’ से सीधा संवाद कर रहे हों,
“आका भी सोचते होंगे… कितनी मेहनत से हमने इसे राजनीति की ‘लाइन’ सिखाई थी… और लाइन तोड़कर भाग निकला!”

मंच पर सन्नाटा छा जाता है। अध्यक्ष जी को लगता है कि कुर्सी हिल रही है… वो और जोर से उसे पकड़ लेते हैं।
उन्हें लगता है जैसे नीचे की जमीन शर्म से पानी-पानी हो रही है और खिसक रही है… उन्होंने पलकें बंद कीं… उन्हें लगा कि सामने बैठे पार्टी के कार्यकर्ता सब फावड़े-कुदाली लेकर आ गए हैं और उनकी कुर्सी के नीचे की जमीन खोद रहे हैं…
उन्होंने आँखें खोलीं… एक बार पुनः कुर्सी को जोर से पकड़ लेते हैं…

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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