मर्दानी -बड़े साहब के बाद बीबी जी और भी बड़ी निकलीं!
रिश्वत कांड में बड़े साहब की मृत्यु के बाद मुआवजे, सरकारी बंगले और अनुकम्पा नियुक्ति के लिए हुए समझौते पर आधारित तीखा हिंदी व्यंग्य।
रिश्वत कांड में बड़े साहब की मृत्यु के बाद मुआवजे, सरकारी बंगले और अनुकम्पा नियुक्ति के लिए हुए समझौते पर आधारित तीखा हिंदी व्यंग्य।
लाफिंग क्लब के बाद अब क्राइंग क्लब! आधुनिक जीवन, अकेलेपन, आंसुओं और रोने की कला पर डॉ. प्रेमचंद द्वितीय का रोचक हास्य-व्यंग्य।
पेपर लीक के विरोध से शुरू हुई ज़ेन ज़ी की किरांति एक इस्तीफ़े के बाद होटल की पार्टी तक पहुँच गई। मगर क्या मंत्री का त्यागपत्र मिलते ही व्यवस्था सुधर गई, भ्रष्टाचार समाप्त हो गया और विद्यार्थियों का भविष्य सुरक्षित हो गया? नई पीढ़ी की आंदोलन-शैली, रील, वाइब, वाटर कैनन और रिज़ाइन-पार्टी पर चुटीला व्यंग्य।
बड़े बाबू से लेकर सोशल मीडिया के स्वयंभू विशेषज्ञों तक—यह व्यंग्य उन ‘ज्ञानचंदों’ पर करारा कटाक्ष है, जो बिना माँगे हर मौके पर राय, नुस्खे और सलाह बाँटते हैं।
जब जीवन का धर्मयुद्ध मोबाइल स्क्रीन पर लड़ा जाने लगे और रिश्तों की पहचान लाइक-कमेंट से होने लगे, तब आधुनिक पार्थ को जगाने के लिए केशव भी नया डिजिटल ज्ञान देते हैं। पढ़िए सोशल मीडिया की आदतों पर तीखा और मनोरंजक व्यंग्य।
क्यूआर कोड ने दुकानों, सब्जी मंडियों, टिकटों और भीख मांगने तक के तरीकों को बदल दिया है। लेकिन जब बाबू चाचा ने बेटे की शादी में लिफाफों की जगह उपहार काउंटर पर क्यूआर कोड लटका दिया, तब डिजिटल भुगतान ने विवाह की परंपराओं में भी शानदार प्रवेश कर लिया। आधुनिक तकनीक और सामाजिक व्यवहार पर रोचक हास्य-व्यंग्य।
लोकतंत्र, राजनीतिक बहस, आरोप-प्रत्यारोप और पंचायत की अराजकता पर आधारित डॉ. राम कुमार जोशी का तीखा एवं हास्यपूर्ण हिंदी व्यंग्य।
सरकारी नौकरी में रहते हुए अतिरिक्त कमाई के सपने देखने वाले दो प्रवक्ता शेयर बाजार के एफ एंड ओ में अपनी किस्मत आजमाते हैं। नतीजा वही निकलता है जो अक्सर बिना समझदारी के निवेश करने वालों का होता है। हास्य, कटाक्ष और जीवन की विडंबनाओं से भरा यह व्यंग्य सरकारी तंत्र और त्वरित अमीरी के मोह पर तीखा प्रहार करता है।
जब सत्ता चली जाती है तो फूल भी कृत्रिम लगने लगते हैं। “पावरलेस बर्थडे के फूल” राजनीति, भीड़तंत्र, होर्डिंग संस्कृति और लोकतांत्रिक नौटंकी पर करारा हास्य-व्यंग्य प्रस्तुत करती है।
छोटे से गांव में फैले प्रेम प्रसंग, पंचायत की चिंता और एक चतुर कोतवाल की अनोखी परीक्षा—“भूत इश्क का” हास्य, विडंबना और देसी मनोविज्ञान से भरपूर व्यंग्य कथा है, जो इश्क़ के चढ़ते और उतरते बुखार का मज़ेदार चित्रण करती है।