समकालीन व्यंग्य की नई पहचान : गिरने में क्या हर्ज़ है (पुस्तक समीक्षा)

व्यंग्य संग्रह ‘गिरने में क्या हर्ज़ है’
व्यंग्यकार :डॉ. मुकेश असीमित
प्रकाशक : भावना प्रकाशन।


डॉ. मुकेश गर्ग असीमित द्वारा कृपापूर्वक भेजी गई प्रस्तुत पुस्तक मुझे बहुत पहले प्राप्त हो गई थी पर बीच में कुछ महीनों के लिए मैं अपने गृहनगर चला गया था इसलिए इस पुस्तक पर अपनी प्रतिक्रिया दे नहीं पाया।

व्यंग्य के क्षेत्र में उदय होने वाले एक और नक्षत्र डॉ. मुकेश गर्ग असीमित का व्यंग्य संग्रह ‘गिरने में क्या हर्ज़ है’ पढ़ते हुए मुझे यह अहसास हो रहा है कि मुकेशजी व्यंग्य की आत्मा को समझने में काफ़ी हद तक समर्थ हुए हैं। मुकेश जी अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ हैं और ‘देर आयद लेकिन दुरुस्त आयद’ नीति के तहत इंजीनियर, डाक्टर, पुलिस, वकील वगैरह का साहित्य के क्षेत्र में प्रवेश की स्वस्थ परंपरा का निर्वाह करते हुए उन्होंने व्यंग्य के क्षेत्र में शानदार तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज़ की है।

प्रस्तुत व्यंग्य संग्रह देश के ख्यातिलब्ध प्रकाशक भावना प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है और इसमें 53 व्यंग्य रचनाएं शामिल हैं। आज के बाजार की मंहगाई को देखते हुए पुस्तक की कीमत मात्र तीन सौ रुपये है जो मोस्ट इकोनॉमिकल(लगभग मात्र छै रुपये प्रति व्यंग्य) कही जा सकती है। लेकिन इस संग्रह में शामिल व्यंग्य रचनाएं निश्चित रूप से अमूल्य हैं। और हां, मेरे लिए यह पुस्तक भी अमूल्य है।

इस पुस्तक का महत्व इस तथ्य से और भी बढ़ जाता है क्योंकि इसकी भूमिका लिखी है आज के सबसे पॉपुलर और स्थापित व्यंग्यकार और व्यंग्यश्री श्री आलोक पुराणिक जी ने। आलोक पुराणिक जी ने लिखा है: ‘अपनी ही पोल खोलना हिम्मत का काम है, मुकेशजी इसे कर लेते हैं। व्यंग्यकार सच्चा व्यंग्यकार तब ही होता है जब अपनी पोल खोलने लगे। चैरिटी बिगिंस ऐट होम की तरह व्यंग्य भी घर से ही शुरु होना चाहिए।’

फ्लैप मैटर में देश के प्रख्यात व्यंग्यकार और व्यंग का इतिहास के रचयिता व्यंग्यश्री श्री सुभाष चंदर और व्यंग्य लोक के संपादक श्री रामस्वरूप दीक्षित जी ने भी मुकेशजी की रचनाधर्मिता के विशिष्ट आयामों की ओर इंगित किया है।

हिंदी व्यंग्य पुस्तक समीक्षा – गिरने में क्या हर्ज़ है
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प्रस्तुत पुस्तक को पढ़ते हुए मुझे जो बातें स्पष्ट रूप से महसूस हुईं वह मैं बिना किसी लागलपेट के बयान कर रहा हूं:

°आज जहाँ लेखक बिना अपने कौशल को तौले व्यंग्य के क्षेत्र में जबरन पदार्पण कर व्यंग्य विधा की छीछालेदार कर रहे हैं और साथ में अपना भी समय नष्ट कर रहे हैं, वहां इस दृष्टि से मुकेशजी एक अपवाद के रूप में नज़र आते हैं। उनके पास नैसर्गिक रूप से व्यंग्य लेखन के लिए ज़रूरी सॉफ्टवेयर है जो व्यंग्य लेखन के लिए जरूरी होता है। सॉफ्टवेयर से मेरा मतलब है मुकेशजी के पास व्यंग्य के लिए वांछित सूक्ष्मदृष्टि है, विसंगतियों एवं प्रवित्तियों को कैप्चर करने का लेंस है और व्यंग्य लिखने से पहले देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार विसंगतियों को विश्लेषित करने की क्षमता भी है।

° मुकेशजी के लिए व्यंग्य लेखन बैठे-ठाले का काम नहीं है बल्कि गंभीर रचनात्मक सृजन है जो उनकी रचनाओं में स्पष्ट नज़र आता है। वे सिर्फ़ लिखने के लिए ही नहीं लिखते हैं बल्कि उनकी कोशिश साफ झलकती है कि उनकी रचनाओं का व्यक्ति एवं समाज पर इम्पैक्ट हो ताकि परिमार्जन की पृष्ठभूमि तैयार हो।

° यदि कोई सफल व्यंग्यकार बनना चाहता है तो उसे समझना होगा कि व्यंग्य लेखन श्रमसाध्य कार्य होता है। इसके पीछे ग्रेट मास्टर्स की रचनाओं को पढ़कर व्यंग्य के गुर, भाषा शैली, वक्रोक्ति, हास-परिहास, विडंबना(आयरनी), विट, ह्युमर इत्यादि की दीक्षा लेने का अथक सश्रम प्रयास होता है। मुकेशजी इस दिशा में भी जागरूक नज़र आते हैं।

°व्यंग्यकार के लिए जरुरी है कि उसके शब्दों में विसंगतियों के प्रति एक ऐसी प्रहारक क्षमता विकसित हो जो पाठक को विचलित करे और उन्हें विसंगतियों के प्रति चेतनासंपन्न बनाये। यह क्षमता सतत प्रयास से विकसित होती है। व्यंग्य लेखन की सफलता तभी मानी जाती है जब बिना किसी को आहत किये अपनी बात कह दी जाय और उस बात का प्रभाव भी दूरगामी हो। व्यंग्य की भाषा में प्रत्यक्ष कथन की जगह वक्रोक्ति की परोक्ष शैली ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। हर व्यंग्यकार को इस दिशा में सतत प्रयास करते रहना है ताकि रचनाएं और प्रभावशाली बन सकें। आशा है मुकेशजी इस दिशा में प्रयासरत रहेंगे।

° हिंदी व्याकरण में वर्णित शब्द-शक्ति अभिधा, लक्षणा और व्यंजना इत्यादि का व्यंग्य रचनाओं में जितना ही ज्यादा प्रयोग होगा रचना की संप्रेषणीयता उतनी ही बढ़ेगी। यह एक सतत प्रक्रिया है और जो भी व्यंग्य के क्षेत्र में हैं उन्हें चाहिए कि व्याकरण के दिशा निर्देश के अनुसार शब्दों, मुहावरों और व्यंजना के नए नए प्रयोग कर रचनाओं में नए प्रभाव उत्पन्न करें।

° मुकेशजी मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े हैं जो एक सामाजिक कार्य है और जिसका दायरा बहुत बड़ा होता है। यह व्यवसाय नए लोगों से मिलने के, उनकी प्रवित्तियों तथा व्यथा-पीड़ा को जानने-समझने के एवं परिस्थितिजन्य विसंगतियों से रू-ब-रू होने के अपार अवसर देता है। इस मामले में मुकेशजी सौभाग्यशाली हैं क्योंकि उनके पास विषयों की विविधता के बड़े अवसर हैं और उन्हें इसका लाभ उठाना चाहिए।

° मैंने जो ग्रेट मास्टर से सीखा है शायद वह किसी काम आए इसलिए लिख रहा हूं। व्यंग्य लेखन दोधारी तलवार पर चलने जैसा है। एक ओर तो विसंगतियों पर निर्मम प्रहार करने की विद्या सीखनी पड़ती है और दूसरी ओर मन में कोमल भावनाओं को भी प्रश्रय देना होता है ताकि करुणा का स्वर खोने न पाये। व्यंग्य तभी पाठक की चेतना को झकझोरता है जब विसंगतियों के बयान के साथ साथ उन विसंगतियों से उपजी व्यक्ति और समाज की पीड़ा करुणा की सृष्टि करे।

प्रस्तुत पुस्तक में जो रचनाएं शामिल हैं उनको पढ़ते हुए लगता है कि मुकेशजी ने अपने व्यापक अनुभव का उपयोग कर ऐसे विषयों को चुना है जो आज सबसे ज्यादा चर्चित समझे जाते हैं। कुछ रचनाएं उल्लेखनीय हैं जैसे गर्मी के तेवर, मेरा लोकतंत्र महान, नेताजी का पर्यावरण दिवस आयोजन, मुझे भी बिकना है, मुझे भी इतिहास बनाना है, कोचिंग की कक्षाओं में कैद कच्चे ख़्वाब, खुदा ही खुदा है, गिरने में क्या हर्ज़ है, पेपर लीकिंग-शिक्षा और राजनीति का नया धंधा, शिक्षक दिवस, इवेंट मैनेजमेंट-विवाह से विसर्जन तक, छपास की बीमारी, चूरण की राजनीति, चंदा का धंधा, आज़ादी के लड्डू, अथ श्री चमचा पुराण, नेताजी का पालतू कुत्ता विकास इत्यादि।

हालांकि ये आज के सबसे प्रचलित विषय हैं पर मुकेशजी अपनी दृष्टि से इनको विश्लेषत करने की कोशिश करते हैं जिसमें एक नई सोच दिखती है। व्यंग्य एक छोटी समस्या को समाज और देश की मूलभूत समस्यायों से जोड़ने की, उन्हें वृहत्तर आयाम देने की और विसंगतियों की जड़ों को तलाशने की प्रक्रिया है और मुकेशजी इस दिशा में आशाजनक प्रयास करते हुए नज़र आते हैं। आज की देशव्यापी समस्याएं हम सभी के सामने हैं, हम जानते हैं कि देश में भ्रष्टाचार की जड़ें बड़ी गहरी हैं, हम उन पर ख़ूब बातें करते हैं, ख़ूब बहसें भी होती हैं पर समस्याएं टस से मस नहीं होती हैं। मुकेशजी कि रचनाओं में शिद्दत से यह स्वर उभरता है।

इसी तरह अपनी अन्य व्यंग्य रचनाओं में मुकेशजी व्यक्ति और समाज की प्रवित्तियों की पड़ताल करते हैं और उन्हें उजागर करने की कोशिश करते हैं। कुछ रचनाएँ इस प्रकार हैं : टाइम नहीं है, लिखें तो क्या लिखें, प्यार की नौटंकी, पड़ोसियों को प्यार करो, चलो कुछ तो अच्छे दिन आए, चिंता शिविर, गले पड़ने वाले दोस्त, शादी में रूठे फूफाजी, गांव का खंडहर सामुदायिक भवन, ईमानदारी की अकड़, गलतफ़हमी के शिकार, कुंवारा लड़का, दुःखी बाप इत्यादि।

सामाजिक समस्याओं की जड़ में मानव की वृत्तियों, प्रवित्तियों, उनकी सोच, अहम् इत्यादि की भूमिका होती है और मानव को उनकी इन प्रवित्तियों का बोध कराना ही व्यंग्य का उद्देश्य होना चाहिए। मानव प्रवित्तियों के कारण ही समाज में झूठ, फरेब, आडम्बर, गलत धारणाएँ, कुरीतियाँ उपजती हैं और फलती-फूलती हैं जो समाज के विकास में बाधक होती हैं। व्यक्ति जो समाज की एक इकाई होता है, यदि इन कुरीतियों के प्रति वह सजग होता है, चेतनासंपन्न होता है तो समाज में सुधार की भूमिका बनती है। समस्याओं को उजागर करने में मुकेशजी काफ़ी हद तक सफल होते हैं पर मेरा मानना है कि व्यंग्यकार एक प्रकार से समाज सुधारक की भूमिका भी निभाता है इसलिए उसे समस्याओं के निवारण के लिए उपचार भी इंगित करना चाहिए।

इस बात को मुकेशजी से ज्यादा अच्छी तरह से और कौन समझ सकता है। वे ख़ुद एक डॉक्टर हैं और जानते हैं रोग के सिम्पटम्स के माध्यम से रोग को डायग्नोज करने के साथ साथ उस रोग का इलाज़ भी करना पड़ता है।

मुकेशजी की रचनाएँ उनके प्रति आशा जगाती हैं और इस बात की पुष्टि करती हैं कि बेशक़ परिमाण में कम हो पर आज अच्छा व्यंग्य साहित्य भी रचा जा रहा है।

मेरी समझ से कुछ मार्गदर्शन हैं जिन्हें मैं यहाँ सूचीबद्ध करना चाहूंगा, जो हर वरिष्ठ या कनिष्ठ व्यंग्यकर्मी के लिए अनुकरणीय होता है :

  • व्यंग्यकार के लिए आत्मसंयम और आत्मनियंत्रण ज़रूरी है ताकि वह लिखने की हड़बड़ी और रातोरात शिखर पर चढ़ने की लालसा से बच सके।
  • व्यंग्यकार को इस बात की साधना में लीन रहना चाहिए कि क्या लिखना है, कितना लिखना है और सबसे बड़ी बात कि क्या नहीं लिखना है।
  • व्यंग्यकार के लिए आत्मावलोकन अर्थात अपने गिरेबान में झंकना बहुत ज़रूरी है। स्वयं गुड़ खाने वाला दूसरों को गुड़ से परहेज करने के लिए कहेगा तो उसका कोई मतलब नहीं है।
  • व्यंग्य लेखन व्यक्तिगत भड़ास निकालने, किसी के प्रति व्यक्तिगत विद्वेष या आक्रोश व्यक्त करने का मंच नहीं है हालांकि हम सब कहीं न कहीं इस द्वेष से मुक्त नहीं हैं। कोशिश यह हो कि हम इस द्वेष से मुक्त हो सकें।
  • व्यंग्यकार यदि निडर और निर्भीक नहीं है, यदि वह लेखन में लाग-लपेट और चापलूसी कि परम्परा अपनाता है तो व्यंग्य लेखन में वह मिसफिट है। उसे व्यंग्य लिखना छोड़ देना चाहिए।
  • व्यंग्यकार के लिए पुरस्कारों को ध्यान में रखकर लिखना, माठाधीशों का शरणागत होना, गुटबंदी या गिरोहबाजी में विश्वास रखना इत्यादि लेखन धर्म से विमुख होने की निशानी है।

मुकेशजी राजस्थान की धरती से सम्बन्ध रखते हैं। बेशक़ मध्यप्रदेश व्यंग्य के लिए उर्वरा भूमि समझी जाती रही है पर व्यंग्य लेखन के लिए राजस्थान भी बहुत उपजाऊ रहा है। इधर राजस्थान से बड़ी संख्या में व्यंग्यकर्मी निरंतर व्यंग्य साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं। मुकेशजी भी उन वरिष्ठ एवं स्थापित व्यंग्यकारों के सहयात्री हैं।

दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल का एक शेर है :
जिस बात का खतरा था सोचो कि वो कल होगी
ज़रखेज़ ज़मीनों में बीमार फ़सल होगी…

लेकिन मैं कल्पना करता हूं कि राजस्थान की बंजर ज़मीनों में साहित्य की फ़सल हमेशा लहलहाती रहेगी।

शुभकामनाओं सहित :

श्रवण कुमार उर्मलिया
19/207 शिवम् खंड, वसुंधरा,
ग़ाज़ियाबाद-201012

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अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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