साहित्य में विज्ञान का विलोम प्रयोग

डॉ मुकेश 'असीमित' May 7, 2026 व्यंग रचनाएं 0

जब साहित्य प्रयोगशाला बन जाए, पुरस्कार गुरुत्वाकर्षण से गिरने लगें और चापलूसी ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ की जगह ले ले — तब न्यूटन, आर्किमिडीज़ और डार्विन भी व्यंग्य में प्रवेश कर जाते हैं। डॉ. मुकेश ‘असीमित’ का समकालीन साहित्य पर तीखा, चुटीला और वैज्ञानिक कटाक्ष।

जाना मेरे सेवानिवृत्ति समारोह में

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 20, 2026 व्यंग रचनाएं 0

एक सेवानिवृत्त कर्मचारी की नज़र से लिखा गया यह हास्य-व्यंग्य लेख रिटायरमेंट समारोह की औपचारिकता, दिखावटी सम्मान और भीतर के खालीपन को चुटीले अंदाज़ में प्रस्तुत करता है। ढोल, भाषण, गिफ्ट और सामाजिक व्यवहार के माध्यम से यह लेख जीवन के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े व्यक्ति के मनोभावों को उजागर करता है।

लाइन में खड़े रहने का हुनर: भारतीय जीवन की सबसे बड़ी स्किल पर व्यंग्य

Prem Chand Dwitiya Apr 15, 2026 व्यंग रचनाएं 1

भारतीय समाज में लाइन में लगना एक कला बन चुकी है—गैस सिलेंडर से लेकर ऑनलाइन बुकिंग तक। पढ़िए एक रोचक और तीखा व्यंग्य “लाइन में खड़े रहने का हुनर”।

सड़क दुर्घटनाओं की बड़ी वजह है अतिक्रमण : क्या प्रशासन कभी जगेगा?

Dr Shailesh Shukla Apr 13, 2026 India Story \बात अपने देश की 2

भारत में सड़क दुर्घटनाओं के बढ़ते आंकड़ों के बीच एक अनदेखा लेकिन गंभीर कारण—अतिक्रमण—कैसे आम नागरिकों की जान के लिए खतरा बन चुका है, इस लेख में उसी पर गहन विश्लेषण किया गया है।

मेरे पास डिग्री है…तेने खन्ने क्या ?

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 31, 2026 हिंदी लेख 0

आज के दौर में आदमी का मूल्य उसके चरित्र से नहीं, फाइल में लगी डिग्री से तय होता है। डिग्री ज्ञान का प्रमाण कम, सामाजिक प्रतिष्ठा का पासपोर्ट अधिक बन चुकी है—और बेरोज़गारी इस पासपोर्ट पर रोज़ वीज़ा रिजेक्ट कर रही है।

ग़ालिब जयंती: “फेल्ट थॉट” का सुपरस्टार—दिल भी, दिमाग़ भी

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 27, 2025 India Story \बात अपने देश की 0

27 दिसंबर को ग़ालिब सिर्फ़ याद नहीं आते—वे हमारे भीतर बोल उठते हैं। उनकी शायरी “फेल्ट थॉट” है: जज़्बात की नर्मी और तर्क की रोशनी का दुर्लभ मेल। ग़ालिब को पढ़ना मतलब अपनी उलझन, तन्हाई और हैरत के लिए सही लफ़्ज़ पा लेना—और फिर उन लफ़्ज़ों के साथ थोड़ा हल्का हो जाना। आज के डिजिटल दौर में भी ग़ालिब उतने ही ज़रूरी हैं—क्योंकि वे हमें नफ़रत से कम, समझ से ज़्यादा जोड़ते हैं।

अकादमी सम्मान की रुकी हुई घोषणा

Vivek Ranjan Shreevastav Dec 19, 2025 व्यंग रचनाएं 0

जब साहित्य अकादमी में प्रेस कॉन्फ़्रेंस बिना प्रेस और बिना कॉन्फ़्रेंस के खत्म हो जाए, तब समझ लेना चाहिए कि साहित्य से ज़्यादा राजनीति बोल रही है—और व्यंग्य चुप नहीं रह सकता।

मुर्दा शहर में आई जान।

हनुमान गोयल Jun 1, 2020 Blogs 0

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