“रिश्तों की गाड़ी और दो करोड़ की एक्सेसरीज़”
जो ग़लतियाँ हमारे साथ हुई हैं, इतिहास हमें वही ग़लतियाँ दोहराने का पूरा मौक़ा देता है—वो भी पूरे आत्मविश्वास और पारिवारिक परंपरा के साथ! जैसे हमारे पिताजी ने हमारी सपाट चल रही ज़िन्दगी की गाड़ी में कुछ “एडवेंचर राइड” के अनुभव के लिए एक सुंदर, सुशील, घरेलू और पारंपरिक आदर्श बहू ढूँढने में जो परिश्रम किया था—अब वैसी ही खोज में हम भी बेटे के लिए जुट गए हैं।
अब क्या करें… आज की डिमांड भी यही है… गृहस्थी में परंपरा और आधुनिकता का ऐसा गठबंधन ज़रूरी है, जैसे बुद्ध ने कहा था—”वीणा की डोरी को इतना भी मत खींचो कि टूट जाए, और इतना भी ढीला मत छोड़ो कि आवाज़ ही न निकले।”
परिवार आज दो छोरों पर खड़ा है—एक ओर अत्यंत परंपरागत सोच वाली पुरानी पीढ़ी, दूसरी ओर अत्याधुनिक आज़ादी की आँधी में सब कुछ उड़ा देने वाली युवा पीढ़ी। और यही कारण है कि “चैट, ब्याह, पट, तलाक” होने लगे हैं।
ख़ैर, बात हो रही थी रिश्ते की।

एक दिन एक रिश्ते के लिए फ़ोन आया… कोई शादी कराने वाला मध्यस्थ था। जी हाँ, आजकल समाज में यह एक नई सामाजिक सेवा चल पड़ी है—बेटे-बेटियों का संबंध कराने का पुण्य लाभ। यह बात दीगर है कि ऐसे मध्यस्थ कई बार जूते खाते हुए भी दिखे हैं… लेकिन फिर भी ‘नेकी कर, दरिया में डाल’ वाले भाव से ये फिर उठ खड़े होते हैं।
बायोडाटा व्हाट्सऐप पर भेजा गया, और शायद यह मानकर कि हमने पढ़ना-लिखना छोड़ दिया है या हमें पढ़ना नहीं आता, उन्होंने फ़ोन पर बायोडाटा का ऑडियो संस्करण भी भेज दिया—लड़की भी डॉक्टर, वही पेशा, सुंदर, किसी निजी कॉलेज से भारी भरकम डोनेशन देकर एमबीबीएस, इंटर्नशिप भी कर चुकी है। एकदम ‘ब्रांड न्यू मॉडल’ कार जैसी—जैसे बाज़ार में आई हो और सेल्समैन उसके फ़ीचर बता रहा हो… हमें कुछ ऐसा ही लगा।

आख़िर में बोले—“अच्छा, आप व्हाट्सऐप देख लीजिए, फिर मैं आपसे बात करता हूँ…”
हमने अभी बायोडाटा पूरा खोला भी नहीं था, लेकिन उनके द्वारा ‘ब्लू टिक’ देख लेने पर उधर से तुरंत फोन आ गया—“साहब, देखा बायोडाटा?”
हमने कहा—“अभी देख रहे हैं, घरवालों और बेटे को भी दिखा देंगे।”
वो बोले—“बेटे को बाद में दिखाइए, पहले आप तो संतुष्ट हो जाइए। रिश्ता तो माता-पिता का निर्णय होता है!”
हमने पूछा—“लेकिन क्या लड़के वालों की तरफ से … मतलब हमारी तरफ से भी आप पूर्ण संतुष्ट हैं?”
वो बोले—“हाँ साहब! आपके बारे में चार रिश्तेदारों से पूरी तहक़ीक़ात कर ली है, तभी तो भेजा है।”
हमने कहा—“लेकिन हमें भी तो कुछ तहक़ीक़ात करनी चाहिए न! आपने तो अपनी तरफ़ से सब कर लिया…”
फिर बोले—“देखिए, बहुत पैसे वाला परिवार है… दस फ़र्में हैं, रुतबा है शहर में… लड़की को पी.जी. कराकर देंगे… और अगर डोनेशन में दो करोड़ तक भी ख़र्चा आ जाए तो भी करेंगे।”
हमें तो लगा कोई शादी नहीं, कार एक्सपो चल रहा है! बोले—“लड़की एकदम लेटेस्ट मॉडल है, एक्सेसरीज़ भी फ्री में देंगे!”
हमने कहा—“ठीक है, लड़की की फ़ेसबुक या इंस्टाग्राम आई.डी. भेजिए, मैं बेटे की भेज देता हूँ। दोनों आपस में बात कर लें, आजकल बच्चे अपनी समझदारी से रिश्ता तय करना पसंद करते हैं।”
कुछ देर बाद फ़ोन आया—“साहब, लड़की के पास फ़ेसबुक या इंस्टा नहीं है। लड़की ख़ानदानी है, ये सब नहीं चलाती… लेकिन साहब, लड़की वाले बहुत अमीर हैं… परिवार बहुत रिच है, पी.जी. भी करा देंगे, शादी में दो करोड़ तो ख़ैर, खर्च करेंगे ही—यह मानकर चलिए!”
मैंने उन्हें टालते हुए कहा—“ठीक है, बेटे से बात कर लूंगा।”
कहा तो नहीं, लेकिन मन ही मन सोचा—उनकी लड़की तो फ़ेसबुक और इंस्टा भी नहीं चलाती, इतनी ख़ानदानी है… मेरा बेटा तो बिगड़ गया है! फ़ेसबुक भी चलाता है, इंस्टा भी… ये रिश्ता कैसे पटरी पर बैठेगा? इसलिए बेटे को बायोडाटा बताना भी उचित नहीं समझा…
चार दिन बाद उधर से फिर फ़ोन आया—
“क्या हुआ, आपने जवाब नहीं दिया?”
हमने कहा—
“देखिए, दरअसल बेटे को बायोडाटा दिखाया ही नहीं।”
वो बोले—
“क्यों साहब?”
वो इतने ढीठ हैं कि जवाब लेकर ही मानेंगे। मैंने बहाना लगाया कि बेटा अभी शादी करने के मूड में नहीं है। इस पर उन्होंने प्रत्युत्तर में कहा—
“तो फिर, गार्ग साहब, आपने बात ही क्यों शुरू की?”
मैंने फिर दूसरा बहाना लगाया—कि बेटे का जवाब अभी आया नहीं है। बायोडाटा तो दिखा दिया है… बहाने और भी हैं, दे दूँगा। लेकिन थोड़ी-सी courtesy तो बनती ही है कि उन्हें असल बात न बताऊँ।
हालाँकि मुझे लगता है, शायद वो यह भी मुझसे उगलवा ही लेंगे।
शायद मुझे कहना पड़ेगा, जो मैं सच में सोच रहा हूँ—
“असल में… हम इतने गरीब परिवार की लड़की से शादी कैसे करें?”
वो चौंकेंगे।
फिर गिनाएँगे—“वो सर, फर्म है, दो करोड़ की एसेट्स हैं। शो-रूम खोलकर बैठे हैं। आप मेरी काबिलियत पर श कर रहे हैं ,हमें पता है, गाड़ियाँ कैसे दिखाई जाती हैं। हमने आपको माइलेज भी बताया गाडी का और आप कह रहे हैं कि लड़की वाले गरीब हैं?”
शायद मैं उनसे कह ही न पाऊँ कि—
“हाँ… धन तो है, पर सिर्फ़ धन। लेकिन संस्कार? न सादगी, न आत्मीयता। ये सब अब चिराग लेकर ढूँढेंगे, तब भी उनके ख़ानदान में नहीं मिलेंगे। बताइए—क्या आप धन से ख़रीद पाएँगे—सुकून की नींद, संस्कार और व्यवहार, दूसरों की इज़्ज़त करना?
क्या ये सब खरीदा जा सकता है?”
मैं नहीं चाहता कि उनके विश्वास को ठेस पहुँचे। शायद वो समझदार होंगे, तो अब फ़ोन नहीं करेंगे।
रिश्ते वास्तव में अब ‘ब्रांडेड डील’ बन चुके हैं—पर रिश्तों की ‘लाइफ़टाइम वारंटी’ का क्या?
क्या रिश्ते सिर्फ़ शो-पीस पार्टनर बनकर रह जाएँगे?
ज़माना बहुत ख़राब आ चुका है, भाई!
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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