“हनुमान जी का नामांकन और जाति का कॉलम”
लोकतंत्र को जैसे कोई अजीब-सा रोग लग गया था। खूब तंत्र-मंत्र हुए, झाड़-फूँक हुई, बहसें हुईं, पैनल बैठे—पर नतीजा वही ढाक के तीन पात। आखिर त्रस्त जनता ने पुकार लगाई—“प्रभु, अब आप ही कुछ कीजिए!”
तब अयोध्या दरबार में निर्णय हुआ। Rama जी ने अपने परम दूत Hanuman को आदेश दिया—“जाओ हनुमान, इस मृतप्राय लोकतंत्र का उद्धार करो। मृत्युलोक में जाकर चुनाव लड़ो, वही अब एकमात्र उपाय है।”
हनुमान जी, जो चिरंजीवी हैं और कलियुग में भी संकटमोचन के रूप में कार्यरत हैं, तुरंत कूद पड़े। उन्हें बताया गया कि लोकतंत्र को सुधारने का जिम्मा अब चुनाव जीतने वाले प्रत्याशी को दिया जाता है। बात कुछ अटपटी लगी, पर आदेश राम का था—सो पालन करना ही था।
तो इस बार हनुमान जी स्वयं चुनाव लड़ने उतर आए थे।
मृत्युलोक में हलचल मच गई। हनुमान जी सीधे चुनाव कार्यालय पहुँचे। चारों ओर कागज़ों का अंबार, बाबुओं का अनुचित व्यवहार और प्रत्याशियों की मनुहार के बीच वे भी फँस गए।
क्लर्क ने बिना माथा उठाए, स्वचालित मशीन की तरह दराज़ से एक फॉर्म निकाला और थमा दिया—
“नाम?”
“हनुमान।”
“पिता का नाम?”
“केसरी… पर असली पहचान तो रामभक्त की है जी।”
क्लर्क हँस पड़ा—
“ओह! तो आप बागी प्रत्याशी हैं? रामभक्त पार्टी का प्रत्याशी तो अभी-अभी फॉर्म भरकर गया है!”
“ठीक है… ठीक है भरिये…लोकतंत्र है भई , सबको लड़ने की आज़ादी है।”
वे फॉर्म भरने लगे, तभी एक कॉलम पर आकर ठिठक गए—
‘जाति’
“ये क्या होता है?”
क्लर्क ने चश्मा सीधा करते हुए कहा—
“अरे, जाति नहीं जानते महाराज ? कौनहू देश से आये हैं आप ? बताओ जाति नहीं पता ! अरे किस जाति में पैदा हुए महराज ?”
फिर हँसते हुए बोला—
“चलो हम ही मालूम कर लेते हैं ,ये जो पूँछ आपने लटका रखी है… ज़रा इधर घुमाइए, हम बता देंगे आपकी जाति!”
आपने तो इतनी स्पष्ट दिखा रखे एही अपनी पूँछ ,यहाँ तो जातिकी पूंछ सभी लंगोट में घुसाए रखते हैं ,जरूरत पड़ने पर ही निकालते हैं l
“वैसे देखिए, हमें जाति पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ती। प्रत्याशी खुद ही क्लियर रहते हैं। आजकल ज़माना ऐसा आन पड़ा कि जाति पूछो तो जाती सूचक नाम से पीड़ा पहुँचाने का कोर्ट केस ठोक दिया जाता है—‘भावनाएँ आहत’ का। इसलिए महाराज, चुपचाप भर दीजिए।”
हनुमान जी ने सरलता से कहा—
“भाई, आप ही तय कर लो… हम तो आज तक राम-सेवा में लगे रहे। साधु आदमी हैं, जात-पांत पूछे न कोई… हरि भजन किया और हरि के हो लिए। हरिभक्त भी कोई जाति नहीं होती क्या?”
क्लर्क चौकन्ना हो गया—
“अरे नहीं महाराज! ‘भक्त’ कोई जाति नहीं है। ऐसा लिखा तो आप साम्प्रदायिक घोषित हो जाएँगे। चुनाव आचार संहिता लगी है—सीधे धाराएँ लग जाएँगी!”
इतने में आसपास खड़े लोग इस जाति-विमर्श का आनंद लेने लगे।
एक ने फुसफुसाया—
“लगते तो मुसलमान हैं… जैसे सुलेमान-रहमान, वैसे हनुमान!”
तभी दूसरी ओर से आवाज़ गूँजी—
“खबरदार! हमारे हनुमान को मुसलमान कहा तो! देखते नहीं तिलक लगाये हैं ,केसरिया बाना पहने हैं !”
तीसरा बोला—
“अरे, ये तो सर्वजातीय हैं… हर जाति में पूजे जाते हैं!”
अब क्लर्क पूरी तरह परेशान—
“तो फिर फॉर्म कैसे भरेगा? सिस्टम में ऑप्शन चाहिए! चलो, आप ही तय कर लो… एक न एक जाति से तो जुड़ना पड़ेगा। ऐसे विजातीय प्रत्याशी को भला कौन वोट देगा?”
“चलो, फिलहाल कैटेगरी तो भरिए—‘जनरल’, ‘ओबीसी’, ‘एससी’, ‘एसटी’ या ‘अन्य’!”
हनुमान जी ने माथा पकड़ लिया—
“ये क्या नया संकट है!”
उन्हें पहली बार अपनी पूँछ भारी लगने लगी।
सोचने लगे—
“कभी ये पूँछ लंका जलाने में काम आई थी… और आज मृत्युलोक में हर इंसान से एक अदृश्य पूँछ बँधी हुई है—जाति की पूँछ। न जाने कितनी राजनीति के चूल्हे इसी से इसी से जल रहे हैं… सिक रही है उस पर नेताओं अफसरों की रोटिया ।”
और उधर चुनाव कार्यालय में फॉर्म अब भी अधूरा पड़ा है—
क्योंकि हनुमान जी की जाति तय नहीं हो पाई…
और शायद…इसी कारण
हनुमान जी कभी चुनाव लड़ ही नहीं पाएँगे।हनुमान जी कभी चुनाव लड़ ही नहीं पाएँगे।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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अंतिम दर्शन का दर्शन शास्त्र
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