आम का मौसम : मधुमेही मनुष्य का मीठा महाभारत
आम कोई आम फल नहीं जी। आम के साथ आम धारणा यही है कि कोई आम आदमी इतना खास भी नहीं हो सकता कि वह आम को पसंद न करे। हाँ, कुछ खास किस्म के आम आदमी जरूर होते हैं,मेरे जैसे डायबिटीज़ के मारे हुए। हम जैसों के लिए आम वैसा ही है जैसे समाज द्वारा किसी अवैध प्रेम-संबंध पर लगा दिया गया प्रतिबंध। सामने महबूबा खड़ी हो,महकती हुई, मुस्कराती हुई, रस टपकाती हुई,और आप ग्लूकोमीटर की अदालत में अपराधी की तरह खड़े हों, हाथ बाँधे, आँखें झुकाए, मन मसोसते हुए।
डायबिटीज़ ने मुझे बड़ा सज्जन आदमी बना दिया है। पहले मैं आम देखता था तो न आव देखता था न ताव, बस दनादन खाने लगता था। अब देखता हूँ तो सिर्फ सूँघता हूँ। मन-वचन से ही उसे छेड़ने लगता हूँ। मेरी हरकतों को भाँपकर श्रीमती जी मुझे एक फाँक पकड़ा देती हैं,“गोली ले ली न? कुछ नहीं होगा एक फाँक से।” जैसे रोते-बिलखते बच्चे को टॉफी देकर बहलाया जाता है, कुछ वैसा ही सलूक। अब इन्हें कौन समझाए कि आम की फाँक भी कोई फाँक होती है? आम खाने का धर्म है कि वह एक फाँक से शुरू होकर आधी बाल्टी पर समाप्त हो। आम खाते हुए संयम रखना वैसा ही है जैसे बरसात में छाता खोलकर नहाना।
मेरे लिए आम अब ऊँचे लटके अंगूरों जैसा हो गया है। वह कितना भी मीठा होने का दावा करे, मैं उसे खट्टा साबित करने में लगा रहता हूँ। घर में आम आते हैं तो मैं उन्हें उसी करुणा से देखता हूँ जैसे कोई बूढ़ा पहलवान अखाड़े को देखता है,कभी हम भी थे मैदान में। कभी दशहरी, लंगड़ा, चौसा, केसर, सफेदा, तोतापरी, अल्फांसो,सबसे दो-दो हाथ करने में माहिर थे। अब संबंध दूर का रह गया है। आमों की टोकरी सामने रखी रहती है और मैं ऐसे देखता हूँ जैसे रेलवे प्लेटफॉर्म पर खड़ी ट्रेन छूट रही हो, टिकट जेब में हो और हम हैं की ट्रेन में बैठ ही नहीं पाए ।
आम की गंध भी बड़ी निर्दयी चीज़ है। वह नाक से सीधे आत्मा में प्रवेश करती है। पके आम की खुशबू आते ही आदमी वर्तमान से निष्कासित होकर अतीत में दाखिल हो जाता है। वह अचानक गाँव के उस बगीचे में पहुँच जाता है, जहाँ दोपहर आग बरसाती थी, पर आम के पेड़ के नीचे संसार ठंडा और सुस्त पड़ा रहता था। ऊपर बौर की गंध, नीचे सूखी पत्तियों की खरखराहट, टहनियों पर हीरामन तोते का अधिपत्य और बच्चों की आँखों में वही षड्यंत्र,कब मालिक की नजर हटे और कब एक ढेला आम की टहनी पर दे मारें।
गाँव में आम खाना पूरा एक अभियान था। कच्ची कैरी अपनी अलग दास्तान लिए रहती थी। जैसे बेटे से ज्यादा पोता प्यारा लगे, वैसे ही आम से ज्यादा कैरी। डालियों पर लटकी कैरियाँ जैसे हमें आह्वान करती थीं,चल निर्मोही, चाँद के पार नहीं तो कम से कम इस डाल के पास। नमक-मिर्च लगाकर कैरी खाना जीभ पर बिजली गिराने जैसा आनंद था। चेहरा सिकुड़ता था, आँखें बंद होती थीं, पर आत्मा खिल-खिल जाती थी। आजकल बच्चे चिप्स के पैकेट में जो खटाई ढूँढ़ते हैं, वह हमारी पीढ़ी ने कच्ची कैरी की पहली काट में ही पा ली थी। गर्मियों में भी आम की डाल पर झूलते हुए जीवन उतना ही काव्यमय लगता था। हवा चेहरे पर लगती थी, पाँव आकाश को छूने का प्रयास करते थे और नीचे खड़े लोग चिल्लाते थे,“अरे धीरे! डाल टूट जाएगी।” डाल शायद ही टूटती थी, पर बड़ों की चेतावनियाँ अवश्य रोज़ टूटती थीं।
कच्चे आम की चटनी का तो कहना ही क्या। नमक, लहसुन, हरी मिर्च और कैरी की चटनी थाली में आ जाए तो सूखी रोटी भी छप्पन भोग की थाली का स्वाद देती थी। कैरी का पना गर्मी में शरीर पर लगे भीतर के पंखे जैसा था। लू बाहर चलती रहती थी और पना भीतर से कहता था,“चिंता मत कर, मैं हूँ।” आजकल फ्रिज की ठंडी बोतलें हैं, पैक्ड जूस हैं, रंग-बिरंगे हेल्थ ड्रिंक हैं, पर आम का पना पीने के बाद जो देसी आत्मविश्वास आता था, वह किसी मल्टीनेशनल पेय में कहाँ!
फिर पके आम का मौसम आता था। घर में बाल्टी, टब, परात,सबका उपयोग बदल जाता था। आम पानी में डाले जाते थे, जैसे सैनिक युद्ध से पहले स्नान कर रहे हों। फिर शुरू होता था आम-भोज। कोई चूसकर खाता था, कोई काटकर, कोई रस निकालकर। चूसने वाले लोग असली आम-रसिक थे। मानो आम के साथ प्रेमालाप चल रहा हो। आम को इस प्रकार खाना किसी भी फिल्म के अश्लील डीप-किसिंग सीन से ज्यादा आपत्तिजनक हो सकता था। गुठली को तब तक नहीं छोड़ते थे, जब तक वह अपने अस्तित्व पर पुनर्विचार न कर ले। हाथ, मुँह, कुर्ता, आत्मा,सब रस से लथपथ। मुख आमरस लिपटाए हम बाल-आम-चटोरे। माँ दूर से देखती थीं और कहती थीं,“इतना मत खा, पेट दुखेगा।” पेट दुखता भी था, पर अगली सुबह फिर वही कार्यक्रम शुरू।
फिर जैसे आम को नजर लग गई। डॉक्टर ने कहा,“मीठा कम।” ग्लूकोमीटर वह आधुनिक यमराज है जो उंगली में सूई चुभोकर आदमी की सारी मिठास का हिसाब माँगता है। मेरे जैसा आदमी दो पाटों में पिस रहा है,एक ओर रस, दूसरी ओर रिपोर्ट। एक ओर चौसा की पुकार, दूसरी ओर फास्टिंग शुगर का फतवा। एक ओर दशहरी की महक, दूसरी ओर HbA1c का डंडा। आदमी आखिर जाए तो जाए कहाँ?
मधुमेही मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह मिठास का महत्व सबसे अधिक समझता है और मिठास से सबसे अधिक दूर रखा जाता है। उसे आम देखकर वही भाव आता है जो किसी साधु को विवाह-बारात देखकर आए। भीतर कहीं बैंड-बाजा-बाराती बज रहा होता है, बाहर चेहरा वैराग्य का। परिवार वाले भी बड़े क्रूर प्रेमी होते हैं। कहते हैं,“आप मत खाइए, आपकी शुगर बढ़ जाएगी।” और यह कहते हुए वे स्वयं आम का रस कटोरे से मुँह में उंडेलते हैं और बचे-खुचे रस को रोटी से पोंछते हैं। यह दृश्य मनुष्य की सबसे गहन आध्यात्मिक परीक्षा है।
आम की प्रजातियाँ भी माशा अल्लाह अपना-अपना स्वभाव लेकर इस धरती पर आई हैं। दशहरी आम एक आम मध्यमवर्गीय गृहस्थ की तरह लगता है,संयमित, सुगंधित, भरोसेमंद। लंगड़ा नाम से भले ही गँवारू लगे, लेकिन स्वाद में अक्खड़ जमींदारी तासीर लिए होता है। चौसा पूरी देहाती उदारता से भरा हुआ,रस ऐसा कि हाथ से कोहनी तक बहता चला जाए। तोतापरी थोड़े शहरी मिजाज का, थोड़े फैशनेबल होटलिया अंदाज में सलाद में सजने को तत्पर। केसरिया में रंग का आत्मविश्वास है, देशप्रेम की अंधभक्ति है। अल्फांसो में महानगरीय महँगाई का गर्व समाया हुआ है। पर गाँव के देसी आम का क्या कहना जी! देसी ठाठ, गंवई अंदाज, कोई नाम नहीं, कोई वंशावली नहीं, कोई ब्रांडिंग नहीं,बिलकुल हम टटपोलियों जैसा। लेकिन पूरा बचपन इन्हीं की छाँव तले बीता।
गाँव के आमों में स्वाद से अधिक उसके चरित्र की चर्चा होती थी। हर पेड़ की अपनी पहचान थी। किसी पेड़ के आम जल्दी पकते, किसी के देर से। जो अपने आप टपक जाए, वह टपका। कोई खट्टा-मीठा, कोई रेशेदार, कोई रसदार। शायद देसी से ही दशहरी निकला होगा। कुछ पेड़ ऐसे थे जिन पर बच्चों की निगाह अधिक रहती थी, क्योंकि उनकी डालियाँ कमबख्त हमारे हाथों की पकड़ में थीं। फिर भला उन्हें तोड़ें क्यों नहीं! ऐसे पेड़ों के रखवाले भी बड़े कड़े होते थे। हीरामन तोते भी बड़े रसज्ञ होते थे। वे हमेशा सबसे अच्छे आम पर चोंच मारते थे। तोते ने जिस आम को चुना, समझिए वह पेड़ का वीआईपी कोटा आवंटित आम है। बच्चे उसी आधे खाए आम को देखकर निर्णय लेते थे कि यह जरूर मीठा होगा।
अब आम बाजार में आते हैं। जैसे आज का शहरी आदमी आम आदमी नहीं रहा, वैसे ही आम भी आम नहीं रहा। कार्टन में, स्टिकर लगाकर, ग्रेडिंग के साथ, वीआईपी संस्कृति में लिपटा हुआ आता है। पहले आम पेड़ से उतरकर सीधे उदर में जाता था, अब सप्लाई चेन से आता है। स्वाद की जगह रेटिंग आ गई। गंध पैकिंग में कहीं दब गई। गाँव का आम असभ्य था, गँवारू था, पर सच्चा था। बाजार का आम सभ्य है, पर थोड़ा संदिग्ध-सा लगता है। आम धीरे-धीरे आम आदमी की थाली से दूर होता जा रहा है। पकने की प्रक्रिया में अब धूप कम, तकनीक ज्यादा काम आ रही है।
फिर भी आम आम है। वह हर साल आता है और आदमी को उसकी औकात याद दिलाता है। खासकर हम जैसे डायबिटीज़ पीड़ितों को। हम आम को देखते हैं, आम हमें देखता है। दोनों के बीच मौन-सा संवाद होता है। आम कहता है,“आओ, हो जाए एक-एक फाँक।” शुगर कहती है,“रुको, इन गलियों में न रखना कदम।” मन कहता है,“थोड़ी-सी बेईमानी कर लें।” बुद्धि कहती है,“रिपोर्ट याद है?” और आदमी वहीं खड़ा रह जाता है,रस और रिपोर्ट के बीच फँसा हुआ।
आम इसलिए प्रिय नहीं कि वह मीठा है। आम इसलिए प्रिय है कि वह हमें हमारे भीतर बची हुई मिठास की याद दिलाता है। वह दादी की अमिया है, माँ के हाथों की खट्टी-मीठी चटनी है, काका की सींची लगाई बगिया है, दोपहर की चोरी है, पेड़ की छाँव है, झूले की उड़ान है, हीरामन तोते की चोंच है और गर्मियों की थकान पर चक कर पी गए कैरी के पने की ठंडी पट्टी है।
डायबिटीज़ ने आम खाने पर पहरा लगा दिया है, पर आम को याद करने पर अभी कोई टैक्स नहीं लगा। इसलिए इस गर्मी में मैं आम कम खाऊँगा तो क्या, लिखने से भला क्यों परहेज करूँ? स्वाद जीभ पर थोड़ी देर रहता है, स्मृति में उम्र भर। और सच कहिए तो आम केवल फल नहीं, भारतीय बचपन के धरातल पर लिखा हुआ पीला, रसदार, सुगंधित स्मृति-लेख है,जिसे डॉक्टर मना कर सकता है, पर मन कभी नहीं।
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