Sankalp Review: दिमागी गेम या धीमी चाल? Prakash Jha की परतदार कहानी का विश्लेषण

“संकल्प” जैसी सीरीज़ का दुर्भाग्य यही है कि वह उस समय आई, जब Dhurandhar अपनी धुरंधर मौजूदगी के साथ हर चर्चा, हर स्क्रीन और हर दिमाग पर कब्ज़ा जमाए बैठी थी। नतीजा—एक गंभीर, दिमागी और परतदार कहानी चुपचाप कोने में बैठकर दर्शकों का इंतज़ार करती रह गई, और दर्शक… वे हमेशा की तरह शोर की तरफ़ भाग गए।

वैसे Prakash Jha का नाम ही काफी है यह समझने के लिए कि कहानी बिहार की पृष्ठभूमि में होगी, राजनीति की गंध आएगी, और हर किरदार अपने भीतर कोई न कोई गुप्त एजेंडा छिपाए घूम रहा होगा। उन्होंने सिनेमा में हमेशा दर्शकों को “सोचने वाला मनोरंजन” दिया—और ओटीटी पर Aashram जैसी सीरीज़ बनाकर यह भी दिखा दिया कि वे सिस्टम की नसों तक हाथ डालने का माद्दा रखते हैं। लेकिन विडंबना देखिए—इतनी हिम्मत दिखाने वाले कलाकार को दर्शकों ने सबसे बड़ा पुरस्कार दिया—“इग्नोर”।

अब बात “संकल्प” की। यह कोई साधारण कहानी नहीं है, बल्कि चाणक्य और चंद्रगुप्त की पुरानी कथा का आधुनिक अवतार है। Chanakya और Chandragupta Maurya की रणनीति अब पटना के एक रहस्यमयी गुरुकुल में जीवित हो उठती है। यहाँ एक साधारण-सा दिखने वाला मास्टर, असाधारण दिमागों की फौज तैयार कर रहा है—कोई IAS, कोई IPS, कोई डॉक्टर, तो कोई भविष्य का मंत्री।

लेकिन कहानी इतनी सीधी नहीं है, जितनी दिखाई देती है। इस गुरुकुल पर आरोप हैं—बच्चों को अगवा करने के, विरोध करने वालों को गायब कर देने के, और एक ऐसे रहस्यमय नियंत्रण के, जिसे लोग काला जादू तक कहने लगते हैं। अफवाहें इतनी घनी हैं कि सच का चेहरा भी धुंधला पड़ जाता है।

असल कहानी 30 साल पुराने एक घाव से जुड़ी है—दिल्ली की सत्ता से, एक मुख्यमंत्री से, और एक ऐसे बदले से, जो शिक्षा के नाम पर पाला गया। सोचिए, एक आदमी तीन दशकों तक हजारों बच्चों को पढ़ाता है, उन्हें ताकतवर पदों तक पहुँचाता है—सिर्फ इसलिए कि एक दिन वह अपने दुश्मन को उसी सिस्टम से घेर सके!

लेकिन कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट वहीं आता है, जहाँ “चाणक्य” को उसका अपना “चंद्रगुप्त” सबके सामने गोली मार देता है। यहीं से दर्शक की समझ की परीक्षा शुरू होती है—क्या यह बदले की कहानी है, या किसी और बड़े खेल की चाल?

सीरीज़ का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि अंत तक आप तय नहीं कर पाते कि Nana Patekar जैसा किरदार ईमानदार नायक है या एक शातिर विलेन। और शायद यही इस शो की ताकत भी है—और कमजोरी भी।

कमजोरी इसलिए कि कहानी जितनी तेज दिमाग से लिखी गई है, उतनी ही धीमी गति से चलती है। एडिटिंग कहीं-कहीं ऐसी लगती है जैसे कहानी को खींचकर रबड़ बना दिया गया हो। दस एपिसोड्स में फैली कहानी कई बार अपने ही बोझ से दबने लगती है। इतने सारे किरदार, इतनी सारी परतें—हर एक की पूरी कहानी सुनाने की ज़िद शो को भारी बना देती है।

फिर भी, यह कोई मसाला शो नहीं है। यहाँ न अनावश्यक मारधाड़ है, न फालतू रोमांस, न चमकदार गाने। यहाँ सिर्फ दिमाग है—चालें हैं, रणनीतियाँ हैं, और हर सीन के पीछे छिपा एक दूसरा अर्थ है। यह वो शो है, जहाँ चेहरे पर मत जाइए—क्योंकि हर चेहरा आपको धोखा देने के लिए ही बना है।

समस्या बस इतनी है कि इसे एक बैठकी में देखना मुश्किल है, और टुकड़ों में देखने पर इसका असर कम हो सकता है। लेकिन अगर आप धैर्य रखते हैं, तो यह कहानी आपको अंत तक खींच ले जाती है—और फिर वहीं छोड़ देती है, जहाँ असली खेल शुरू होना था।

कुल मिलाकर—“संकल्प” एक अलग हटकर, दिमागी और महत्वाकांक्षी सीरीज़ है। आइडिया जबरदस्त, अभिनय मजबूत, लेकिन एडिटिंग ढीली और अंत अधूरा। पाँच में से तीन स्टार्स तो बनते ही हैं—लेकिन एक कसक रह जाती है कि 7–8 घंटे देने के बाद भी हाथ में पूरा सच नहीं आता।

अब फैसला आपका है—समय देना है या फिर भीड़ के साथ वही देखना है, जो ज़ोर से चिल्ला रहा है।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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