बात में वज़न होना चाहिए

डॉ मुकेश 'असीमित' May 29, 2026 व्यंग रचनाएं 0

आज के समय में सिर्फ बात करना काफी नहीं है, बात में वज़न भी होना चाहिए। राजनीति से लेकर मीडिया, ज्योतिष, अर्थव्यवस्था और चिकित्सा जगत तक हर जगह "भारी" शब्द का बोलबाला है। डॉ. मुकेश असीमित का यह व्यंग्य उसी मानसिकता पर चुटीला कटाक्ष है, जहाँ हल्की बातों की कोई कीमत नहीं और हर चीज़ को खबर बनने के लिए भारी होना ज़रूरी है।

शोक सभा में जाने की कला: बाब्बन चाचा की फील्ड ट्रेनिंग

डॉ मुकेश 'असीमित' May 8, 2026 व्यंग रचनाएं 0

शोक सभा में जाना भी एक सामाजिक परीक्षा है। बाब्बन चाचा इस परीक्षा में इतने अनुभवी हैं कि संवेदना व्यक्त करते-करते रिश्ता, पुट्टी और प्रॉपर्टी तक की चर्चा छेड़ देते हैं।

थर्ड एसी में दो बाल-आतंकियों के संग – एक हास्य-व्यंग्यात्मक रेल यात्रा संस्मरण

डॉ मुकेश 'असीमित' May 4, 2026 संस्मरण 0

थर्ड एसी की एक साधारण-सी यात्रा कैसे दो बच्चों की वजह से हास्य और अराजकता का महाकाव्य बन जाती है—यह संस्मरण उसी अविस्मरणीय रात की कहानी है, जहाँ नींद शहीद हो जाती है और व्यंग्य जन्म लेता है।

मुख्य अतिथि बनने की राह – बड़े धोखे हैं इन राहों में

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 27, 2026 व्यंग रचनाएं 0

मुख्य अतिथि बनना केवल सम्मान नहीं, एक कला है—जिसमें मुस्कान सार्वजनिक होती है और असहजता निजी। यह व्यंग्य उसी ‘कुर्सी’ के इर्द-गिर्द घूमती सामाजिक सच्चाइयों को उजागर करता है।

विश्वास करने की कला –आर्ट ऑफ़ बीलिविंग

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 24, 2026 व्यंग रचनाएं 0

विश्वास जीवन की सबसे पुरानी मुद्रा है। गणित के मास्टरजी के “मान लो” से लेकर प्रेमी के चाँद-तारे, बाबा के स्वर्ग, बाजार की स्कीम और राजनीति के घोषणा पत्र तक—हर जगह आदमी विश्वास करता कम है, करवाया ज्यादा जाता है।

हे ग्रीष्म देवी ,हे प्रचंड तापसी

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 22, 2026 व्यंग रचनाएं 0

जब ग्रीष्म ऋतु देवी का रूप धरकर पृथ्वी पर उतरती है, तो सड़कें सूनी हो जाती हैं, बिजली आंख-मिचौली खेलने लगती है, जलजीरा और आइसक्रीम जीवनदायिनी प्रतीत होते हैं, और मनुष्य वातानुकूलित गुफाओं में शरण लेने लगता है। यह व्यंग्य रचना भारतीय गर्मी की त्रासदी को हास्य, तंज और सांस्कृतिक बिंबों के साथ बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत करती है।

खाली वायदों का कार्ड: मुफ्त इलाज की राजनीति और अस्पतालों की त्रासदी

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 20, 2026 Health And Hospitals 0

“कार्ड हाथ में है, भरोसा दिल में है—लेकिन इलाज फाइलों में अटका हुआ है। ‘खाली वायदों का कार्ड’ एक ऐसा व्यंग्य है जो स्वास्थ्य योजनाओं के पीछे छिपी सच्चाई को बेनकाब करता है।”

जाना मेरे सेवानिवृत्ति समारोह में

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 20, 2026 व्यंग रचनाएं 0

एक सेवानिवृत्त कर्मचारी की नज़र से लिखा गया यह हास्य-व्यंग्य लेख रिटायरमेंट समारोह की औपचारिकता, दिखावटी सम्मान और भीतर के खालीपन को चुटीले अंदाज़ में प्रस्तुत करता है। ढोल, भाषण, गिफ्ट और सामाजिक व्यवहार के माध्यम से यह लेख जीवन के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े व्यक्ति के मनोभावों को उजागर करता है।

हुकूमत बदली और हवेलियाँ काँपी: बुलडोज़र राजनीति पर तीखा व्यंग्य

Ram Kumar Joshi Apr 18, 2026 हिंदी कविता 1

एक तीखा व्यंग्य जो सत्ता परिवर्तन, बुलडोज़र राजनीति और रसूखदारों के बदलते चेहरे पर करारा कटाक्ष करता है। पढ़ें यह समकालीन सामाजिक-राजनीतिक कविता।

शर्म आती नहीं हमें — और यह हमारी राष्ट्रीय उपलब्धि है

डॉ मुकेश 'असीमित' Apr 15, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“हमने बेशर्मी को साधना की तरह साध लिया है—और अब जब पड़ोसी देश सुधार की बात करते हैं, तो हमें असुविधा होने लगती है।” यह व्यंग्य न केवल भारतीय राजनीति की विडंबनाओं को उजागर करता है, बल्कि हमारे सामाजिक स्वभाव पर भी तीखा सवाल खड़ा करता है।