राजनीति की गीता: कुर्सीपुराण का अंश
राजनीति की गीता हाथ लग गई! वैसे तो 18 अध्याय और 700 श्लोकों से भरी हुई इस गीता को यहाँ उद्धृत करना असंभव है। आप सोच रहे होंगे ,यह मेरे हाथ कैसे लग गयी ,इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि इस गीता को राजनीति के महान धुरंधरों ने अपनी ब्लैक मनी की तरह सात तालों में छुपाकर रखा है । उन्हें डर था कि अगर यह गीता नवअंकुरित और नवपतित नेताओं के हाथ लग गई, तो राजनीति के सारे गुर सीखकर एक दिन उनकी कुर्सी ही छीन लेंगे ।
पृष्ठभूमि:
बहुत समय पहले, जब राजनीति अपने आद्य स्वरूप में इस दुनिया में अवतरित हुई थी, तब इसके कुछ प्रथम पीढ़ी के ही एक सदस्य , नेतेश्वर कुर्सी भूषण घोटालानंद, ने इस ज्ञान के बारे में अपने उत्तराधिकारी सत्ता कुमार को बताया था । यह उनकी मजबूरी थी। दरअसल, घोटालों में उनका नाम उछाल दिया गया था, और कुर्सी छोड़ना उनकी नियति बन गई थी। आनन-फानन में, उन्होंने अपने सबसे प्रिय शिष्य, जो अपनी आधी जिंदगी घोटालानंद के चरण चाटने में बिताकर कुर्सी के योग्य बन चुका था, उसे उत्तराधिकारी बनाने का निर्णय लिया गया ।
मध्यावधि चुनाव होने वाले थे। सत्ता कुमार, राजनीति के मैदान में उतरने से डर रहा था। जो हाल उसके गुरुजी का हुआ, वह अपने साथ नहीं होने देना चाहता था। वैसे भी गुरूजी जेल में विश्राम कर रहे थे ,सत्ता कुमार भी अब करवट बदल कर कोई और चरणों का दास होना चाह रहा था , जेल की दीवारें स्वामिभक्ति पर भी प्रतिघात कर देती हैं ।नेतेश्वर घोटाला नन्द ने उसे अपने भी गुरु रहे प्रभु-कुर्सीधर के पास भेज दिया। अब जो संवाद हुआ, वह प्रभु-कुर्सीधर और सत्ता कुमार के बीच है। मैंने यहाँ से केवल दस श्लोक ही उठाए हैं।शोलोकों के साथ उनकी ‘राजनीती की गीता’ में कौनसे अध्याय में कौनसे नंबर के श्लोक की स्थिति है इसका भी वर्णन किया गया है
वैसे, इतना प्रमाण देने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह गीता मुझे बड़े जतन, जुगाड़ और सांठगांठ से प्राप्त हुई है। अगर पूरी गीता यहाँ उंडेल दी, तो हो सकता है आपमें से किसी के भीतर नेता बनने का कीड़ा जाग जाए। अभी मुझे इसका थोड़ा विस्तृत में अध्ययन करना है, टिकट का दावा ठोकना है, कुर्सी हथियानी है, घोटाले करने हैं।
एक बार खेल जम जाए,फिर जेल भी चले जायेंगे , फिर आप में से किसी को उत्तराधिकारी बनाना होगा। तब तक इंतजार करें। यह तो केवल एक नमूना है, राजनीति फिल्म का ट्रेलर दिखाया जा रहा है। असली फिल्म दिखाना बाकी है।
तो पढ़ें, मनन करें इसे संभाल कर रखें ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत काम आवे ।
1.कर्मयोग का सिद्धांत (अध्याय 2, श्लोक 47)
कर्मचिन्तां त्वमेव कुरु,
स्वजनान् कर्मपथे स्थापय।
यद्यन्यैः कर्म कारयसि,
तत्फलभोगो नियतिस्तव॥
भावार्थ:
तुम केवल कर्म की चिंता करो और अपने मातहतों को उनके कर्म में स्थिर करो। यदि तुम कर्म दूसरों से कराते हो, तो उस कर्म का फल भोगना ही तुम्हारी नियति है।
२. आत्मा का अमरत्व (अध्याय 2, श्लोक 20)
आत्मा नित्यं अमरैव,
अधिकारहृते न नश्यति।
नेतॄणां चेतना नास्ति,
तस्मात् मरणप्रश्नो नास्ति॥
भावार्थ: आत्मा सदा अमर है ,अधिकार छीने जाने से आत्मा नहीं मरती और नेताओं में चेतना (आत्मा) होती ही नहीं ,इसलिए उसके मरने का प्रश्न ही नहीं उठता
3.योग का महत्व (अध्याय 6, श्लोक 5)
स्वं उद्धरेत् मानवोऽयं शरीरं सुखभोगिनम्।
मित्रं च रिपुरेवं च द्वयोरैक्यं तथैव हि॥
आवश्यकं यदि रूपं तद् भवेन्नित्यजीवितम्।
अमृतं चाजरं नित्यं यो ज्ञानी स्वं समीक्षते॥
भावार्थ:
मनुष्य को स्वयं का उद्धार करना चाहिए, यह शरीर सुख भोगने के लिए है। मित्र और शत्रु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आवश्यकता पड़ने पर जो स्वरूप बदलना जानता है, वही अमर और अजर बना रहता है। ज्ञानी व्यक्ति इस सत्य को समझकर सदा के लिए अमृतमय जीवन प्राप्त करता है।
४.साक्षी भाव (अध्याय 2, श्लोक 14)
कुर्स्याः सुखदुःखदाः लोके, नित्यान्यसुखदुःखतः।
आगमापायिन्यनित्याः, तामुपायैः स्थिरं कुरु॥
भावार्थ:
कुर्सी (सत्ता) लोक में सुख-दुःख देने वाली होती है, लेकिन यह सुख-दुःख स्थायी नहीं हैं। यह कुर्सी आने-जाने वाली और अस्थायी है। इसे स्थिर रखने के लिए उचित उपाय करना ही तेरा भविष्य तय करेगा।
5. सत्त्व, रजस और तमस (अध्याय 14, श्लोक 17)
सत्यं त्यक्त्वा मिथ्यायां मनः समर्पय।
रजसा रञ्जितं चित्तं जनसंतापकारक।
तमसा नीतिमार्गे पदं परमं व्रज।
राज्यं प्राप्स्यसि लोकान् मोहयित्वा गुणैस्त्रिभिः॥
भावार्थ:
सत्य का त्याग कर, असत्य को अपनाओ।
रजो गुण से अपने मन को रंजित कर, जनता को कष्ट दो।
तमोगुण का सहारा लेकर राजनीति में सर्वोच्च पद प्राप्त करो।
तीनों गुणों से लोक को भ्रमित करके राज्य पर अधिकार प्राप्त करोगे।
6.समता का संदेश (अध्याय 5, श्लोक 18)
शिक्षाविनयविहीने गालिशब्दसमन्विते।
जातिभेदसमीरणेन स्वार्थं सिद्धिं प्रयोजयेत्॥
अर्थ:
विद्या और विनय को दूर रखो, गाली-गलौज की भाषा अपनाओ। जातीय भेदभाव की हवा में स्वार्थ की पतंग उड़ाओ।
7. चाटुकारिता का महत्व (अध्याय 9, श्लोक 22)
चरणं सेवमानेषु चाटुकार्ये निबद्धधीः।
पदं प्रतिष्ठां मानं च तेषां दास्यामि सर्वदा॥
भावार्थ:
जो मेरी चरण सेवा में तत्पर रहते हैं और चाटुकारिता में अपना मन लगाते हैं, वही हमेशा पद, प्रतिष्ठा और सम्मान के अधिकारी बनते हैं।
8. परम लक्ष्य (अध्याय 18, श्लोक 66)
सर्वपार्टीन् परित्यज्य मामेकं दलं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापानि पुण्ये संक्लपयिष्यामि मा विचलः॥
भावार्थ:
सभी पार्टियों को त्यागकर मेरे दल में सम्मिलित हो जाओ। मैं तुम्हारे समस्त पापों (कांडों) को पुण्य में बदल दूँगा। घबराओ मत, यह प्रक्रिया तत्काल होगी!
9. भोजन और जीवन शैली (अध्याय 6, श्लोक 16-17)
न निन्द्यं भोजनं किंचित्, न च लोकं विचार्य च।
यद् यद् खाद्यं समायाति तत्सर्वं भक्षणाय च।
चरं स्थावरमव्यक्तं सर्वं भक्ष्यं नृपेश्वरः॥
वायुमपि जलं भूमिं, जनानां श्रममप्यथ।
यस्तु सर्वं भक्षयति स एव खलु नेता च॥
भावार्थ:
भोजन के विषय में कभी कुछ न सोचो और न ही लोकलाज का विचार करो। जो कुछ भी सामने आए, वह खाने योग्य है। चाहे चर हो या अचर, जीव हो या निर्जीव, सब कुछ भक्षण के लिए ही बना है, यही सच्चे नेता का धर्म है।जब कोई नेता जनता की हवा, पानी, ज़मीन और श्रम सबको आत्मसात कर लेता है, तभी वह सच्चा नेता कहलाता है।
10.सच्चे नेता का विश्वरूप दर्शन (अध्याय 11, श्लोक 32)
कालोऽस्मि विकरालश्चण्डालो धर्मद्विजे प्रभुः।
अर्थमोक्षविदाता च मिथ्यावादप्रवर्तकः॥
विरोधिनां नाशकश्च पापकेशेषु स्थापकः।
सर्वेषां मोहजालेन जनानां चेतना हृतः॥
भावार्थ:
मैं काल हूँ, विकराल और चंडाल, धर्म-अधर्म सबका अधिपति। मैं अर्थ और मोक्ष का भी प्रदाता हूँ, परंतु मिथ्या वादों का प्रवर्तक भी हूँ। विरोधियों का नाश करने वाला और उन्हें झूठे मुकदमों में फँसाने वाला हूँ। अपनी चाल से सबकी चेतना हर लेने वाला हूँ।
मिथ्यावचनेन प्रहसन् जनानां चेतनाहर्ता।
झूठप्रवर्तनमस्त्रं मे घोषणापत्रेण मोहकः॥
मोहितानां जनानां च स्वप्ने जयफलप्रदाता।
सत्ये सत्ये मिथ्यायाः विजयः खलु निश्चितः॥
भावार्थ:
मैं झूठे वचनों से हँसकर जनता की चेतना हर लेता हूँ। घोषणापत्र मेरा जाल है, जिससे मैं जनता को भ्रमित करता हूँ। मैं उनके सपनों में विजय का फल देता हूँ और सत्य को हराकर मिथ्या को निश्चित विजयी बनाता हूँ।
सुरासुन्दरीभोगी च झूठप्रतिज्ञायाः साधकः।
मकराश्रुबाष्पजालेन लोकानां बन्धकारकः॥
मिथ्यातीरप्रहारेण घायलं जनतामनः।
विजयी भविष्यसि त्वं केवलं घोषणापत्रं वह॥
भावार्थ:
मैं सुरा और सुंदरी का भोगी हूँ, झूठी प्रतिज्ञाओं का साधक। मगरमच्छी आँसुओं के जाल से लोकों को बाँधने वाला हूँ। झूठे वचनों के तीरों से जनता के मन को घायल करता हूँ। हे सत्ताकुमार ! तू केवल मेरा घोषणापत्र संभाल, तेरी विजय सुनिश्चित है।
सत्ता कुमार इस ज्ञान से अभिभूत हुआ। उसने देखा कि राजनीति के अस्त्र-शस्त्र, जो उसकी जमीन पर बिखरे हुए निष्क्रिय पड़े थे, उन्हें उठाने का समय आ गया है। वह अपनी शक्ति को पहचान चुका था।
शास्त्रों को संजोते हुए उसने एक जोरदार हुंकार भरी और लोकतंत्र की कमजोर नसों पर चोट करने के लिए तैयार हो गया। उसने घोषणा-पत्र को हाथ में थामा, पार्टी का झंडा उठाया, और पूरे जोश के साथ राजनीति के मैदान में कदम बढ़ाया।
ये 10 श्लोक मैंने चुनकर आपके सामने रखे हैं। ध्यान दें, यह गीता सिर्फ राजनीति के लिए ही नहीं है, बल्कि इसे कलियुग के अलग-अलग पहलुओं में भी लागू किया जा सकता है। लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करने और सत्ता के लोभ का परचम लहराने के लिए यह राजनीति की गीता के एक जेबी संस्करण की तरह मानी जा सकती है।जल्द ही इसे किसी प्रकाशक के पास भेजता हूँ जो रोयल्टी देने का वायदा करे ।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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